Oops! It appears that you have disabled your Javascript. In order for you to see this page as it is meant to appear, we ask that you please re-enable your Javascript!
    | | Contact: 8407908145 |
    Published On : Fri, Jun 1st, 2018

    देश में स्मृतिलोभ और आत्मविस्मृति गंभीर समस्या – अरुण कुमार

    नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश की पौराणिक मान्यताओं के साथ विकास पर बल देता रहा है। संघ की सोच में भारत को अगर विश्व गुरु बनने की सोच को साकार करना है तो उसे अपने स्वदेशी आदर्शो को आत्मसाथ करना ही होगा। संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने संघ की सोच को दोहराते हुए कहाँ कि देश में स्मृतिलोभ और आत्मविस्मृति गहरे तक पैठ कर चुकी है। हम अपनी विरासत को भूलकर पश्चिमी सभ्यता द्वारा बनाये गए जाल में जकड़ चुके है। हमें लगता है की ब्रिटिश अगर न आये होते तो हम कुछ न होते, उनके द्वारा विकसित की गई व्यवस्थाएं आज भी देश में लागू है और हमें लगता है वही सही है। लेकिन ये धारणा गलत है। इसमें बदलाव की आवश्यकता है।

    अरुण कुमार संघ कार्यो की प्रचार संस्था विश्व संवाद द्वारा आयोजित आद्य पत्रकार नारद जयंती पत्रकार पुरस्कार वितरण समारोह में बतौर प्रमुख अतिथि उपस्थित थे। उनके मुताबिक देश और समाज के विकास के लिए मौलिक अनुसंधान की जरुरत है। 1840 में देश का पहला अख़बार उदन्त मार्तण्ड निकालता है जिसमे नारद मुनि की तस्वीर अख़बार के मस्टर्ड में छपी होती है लेकिन तब इस पर कोई विवाद नहीं होता। विवाद होता है वर्ष 2000 में ऐसा क्यूँ हो रहा है इस पर मंथन की आवश्यकता है। वर्त्तमान समय में शुरू विमर्श पर विचार किये जाने की आवश्यकता है। देश में वैचारिक संघर्ष खड़ा हो चुका है। इसलिए अपने आदर्शो को तय करना जरुरी है।आदर्श पुरुषों के आदर्श अपनाकर समाज के हर क्षेत्र में सक्षम बना रह सकता है।

    उन्होंने उदहारण देते हुए बताया कि किस तरह ब्रिटिश शासकों ने शिक्षा को हथियार बनाकर हमारी सोचने की क्षमता को विलुप्त किया। कॉन्सेप्ट ऑफ़ भारत और विचार ऑफ़ भारत के बारे में सोचना पड़ेगा। राष्ट्र में सिर्फ राजनीति के जरिये बदलाव हो जाये ये संभव नहीं। इसके लिए मौलिक विचारों को अपनाना जरुरी है।

    स्वतंत्रता का आंदोलन मौलिक अनुसंधान व भारतीय भाषाओं को लेकर भी था। संघर्ष की वह लड़ाई भटक गई। राष्ट्र व समाज के विकास के लिए परिवर्तन की आवश्यकता है। अपेक्षित परिवर्तन के लिए विचार, आदर्श और आदर्श को मानने वाले लोगों का काफी महत्व रहता है। वैचारिक संघर्ष के मामले में जेएनयू प्रकरण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहाँ अब देश की अस्मिता और सम्मान पर सवाल उठाने वालों की भी कमी नहीं है। राष्ट्र की संकल्पना महज ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं है। सनातन धर्म राष्ट्र की आत्मा है। यही बात पत्रकारिता के पेशे से जुड़े लोगो के लिए भी लागू होती है इस बात को पत्रकारों को भी समझाना चाहिए उन्हें अपने आदर्शो को नहीं भूलना चाहिए।

    कार्यक्रम में बतौर अध्यक्ष राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज विश्वविद्यालय के कुलगुरु सिद्धिविनायक काणे ने शिक्षा के साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापार और राजनीति के आ जाने पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहाँ की इन दोनों चीजों ने शिक्षा को बुरी तरह प्रभावित किया है और पत्रकारिता का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। एक अख़बार किसी खास राजनीतिक विचारधारा का पक्षधर हो सकता है लेकिन एक पत्रकार सजगता के साथ चलते हुए अपना काम कर सकता है। अख़बार में नकारात्मकता हावी हो रही है। अपने विद्यार्थियों से कराये गए एक सर्वे को आधार बनाकर उन्होंने कहाँ आज आप कोई भी अख़बार देख लीजिये उसकी 80 फीसदी समाचारो का शीर्षक नकारात्मकता से भरा हुआ रहता है। बदलाव सकारात्मकता से आता है जिसे अपनाने का प्रयास होना चाहिए।

    पत्रकार सम्मान पुरस्कार 2018 से सम्मानित पत्रकार

    अविनाश महालक्ष्मे- महाराष्ट्र टाइम्स
    प्रवीण मुधोलकर – न्यूज़ नेटवर्क 18
    नंदू अंधारे – द हितवाद

    डॉ हेडगेवार ब्लड बैंक के अनंतराव भिड़े सभागार में आयोजित कार्यक्रम की प्रस्तावना विश्व संवाद केंद्र नागपुर के प्रमुख प्रसाद बर्वे ने जबकि अतिथियों का सत्कार विदर्भ प्रांत प्रचार प्रमुख अनिल साबरे ने किया। कार्यक्रम में अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र कुमार और विश्व संवाद केंद्र नागपुर के डॉ समीर गौतम प्रमुखता से उपस्थित थे।


    Trending In Nagpur
    Stay Updated : Download Our App
    Mo. 8407908145