Published On : Thu, Oct 4th, 2018

याचिका : निर्दलियों को बराबरी से प्रचार करने बड़े दलों के साथ मिले चुनाव चिन्ह

Nagpur Bench of Bombay High Court

नागपुर: चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के प्रत्याशी और निर्दलीय प्रत्याशियों में चुनाव चिन्ह वितरण प्रक्रिया में खामियां होने के कारण एवं राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों के लिए चुनाव चिन्ह पूर्व निर्धारित होने से उन्हें प्रचार के लिए अधिक समय मिलने तथा निर्दलीय प्रत्याशियों को मतदान के 15 दिन पहले चुनाव चिन्ह मिलने से प्रत्याशियों के बीच की चुनावी लड़ाई न्यायोचित नहीं होने से राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह भी फ्रीज करने की मांग करते हुए मृणाल चक्रवर्ती की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई.

याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश भूषण धर्माधिकारी और न्यायाधीश मुरलीधर गिरटकर ने केंद्र सरकार और केंद्रीय चुनाव आयोग (ईसीआई) को नोटिस जारी कर जवाब दायर करने के आदेश दिए. याचिकाकर्ता की ओर से स्वयं मृणाल चक्रवर्ती, केंद्र सरकार की ओर से असि. सालिसिटर जनरल उल्हास औरंगाबादकर और चुनाव आयोग की ओर से अधि. नीरजा चौबे ने पैरवी की.

संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन
याचिकाकर्ता की ओर से याचिका में बताया गया कि चूंकि पंजीकृत राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को पहले से चुनाव चिन्ह निर्धारित होता है. अत: चुनाव की प्रक्रिया में चुनाव चिन्ह वितरण के काफी पहले से उनका प्रचार शुरू हो जाता है. यहां तक कि लोगों के बीच उनके चुनाव चिन्ह को लेकर पहले से जानकारी प्रसारित हो जाती है, लेकिन निर्दलीय रूप में चुनाव लड़नेवाले प्रत्याशियों को मतदान के केवल 15 दिन पहले चुनाव चिन्ह का वितरण किया जाता है, जिससे उनका चुनावी प्रचार शुरू नहीं हो पाता. ‘इलेक्शन सिम्बल (अलाटमेंट एंड रिजर्वेशन) आर्डर-1968’ के आधार पर राजनीतिक दलों द्वारा पहले लड़े गए चुनावों के आधार पर चिन्ह का वितरण किया जाता है. इस तरह से संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समान अधिकार का उल्लंघन होता है.


जनतंत्र के मूल उद्देश्य के लिए घातक
याचिकाकर्ता का मानना था कि रिप्रेजेन्टेशन आफ पिपल एक्ट के अनुसार प्रत्याशी का चयन उनकी उम्र, योग्यता, आपराधिक रेकार्ड आदि के आधार पर किया जाता है, न कि राजनीतिक दलों के आधार पर होता है. लेकिन ईवीएम में राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह और प्रत्याशी का उससे जुड़ा नाम होने से उन्हें इसका अधिक लाभ होता है.

इस तरह से गैरसमानांतर अधिकार दिया जाना न केवल असंवैधानिक है बल्कि इससे जनतंत्र के मूल उद्देश्य को भी क्षति पहुंचती है. याचिकाकर्ता ने 1968 को जारी किए गए इस आदेश को गैरसंवैधानिक और गैरकानूनी घोषित करने का अनुरोध किया. साथ ही इस तरह से पंजीकृत और गैरपंजीकृत राजनीतिक दलों में वर्गीकरण करने से मुख्य चुनाव आयोग को रोकने के आदेश देने का भी अनुरोध किया गया.