Published On : Sat, Dec 1st, 2018

डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म भाषाई अख़बार के लिए खतरा : अध्यक्ष परेश नाथ, इलना

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नागपुर: भारतीय भाषाई समाचार पत्र संगठन ने देश में बढ़ते अंग्रेजी भाषा के प्रभुत्व और नव उदयमान डिजिटल मिडिया प्लेटफॉर्म को भाषाई अखबारों के लिए बड़ा ख़तरा बताया है। नागपुर में प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में अपने विचार रखते हुए इलना के राष्ट्रीय अध्यक्ष परेश नाथ ने कहाँ कि देश में अंग्रेजी भाषा का विस्तार हो रहा है जिस वजह से भाषाई और हिंदी अखबारों के प्रति पाठकों की रूचि कम हो रही है। मीडिआ के नये प्लेटफॉर्म डिजिटल मिडिया ने भी इन अखबारों के सामने चुनौती प्रस्तुत कर दी है।

नाथ के अनुसार डिजिटल माध्यमों के स्वरुप में जो खबरें पाठकों के बीच जा रही है उसकी तथ्यात्मकता की जाँच की कोई प्रक्रिया नहीं है। जिससे खबरें सही है या झूठी यह पता नहीं चल पाता। इलना की वार्षिक आम सभा की बैठक नागपुर के पास पेंच में आयोजित की गई है। इसी बैठक में हिस्सा लेने के लिए संगठन के सदस्य नागपुर पहुँचे है। शनिवार को संगठन के पदाधिकारियों ने प्रेस वार्ता ली। इस दौरान संगठन के अध्यक्ष परेश नाथ ने भाषाई अखबारों के समक्ष उपस्थित समस्याओं की जानकारी दी। इस दौरान उनके साथ संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रकाश पोहरे,राज्य के अध्यक्ष शिव अग्रवाल विशेष तौर पर उपस्थित थे।

नाथ के मुताबिक भाषाई समाचार पत्र देश की आवश्यकता है लेकिन यह भी हकीकत है की अधिक चर्चा अंग्रेजी के अखबारों की होती है। पर भाषाई अख़बार ज्यादा प्रकाशित हो रहे है। पाठक भी अधिक है यह सुखद बात है। सरकार का षड्यंत्र है कि वह भाषाई अखबारों को समाप्त करना चाहती है। सरकारी विज्ञापन नीति के चलते कई छोटे अख़बार बंद हो रहे है। खुद सरकार अंग्रेजी अखबारों को विज्ञापन देने में अधिक रूचि दिखा रही है। जिस तरह के निजी क्षेत्र में कुछ कम्पनिया अपनी मोनोपोली स्थापित कर बाजार को संचालित करती है अब कुछ ऐसा ही हल समाचार पत्र के व्यवसाय में भी हो चला है।

उन्होंने ने कहाँ कि अखबारों से सम्बंधित शिकायतों के निपटारे के लिए बनाई गई संस्था भारतीय प्रेस परिषद का काम मनमानी ठंग से चल रहा है। कई मुकदमे पेंडिग है। प्रकाशकों संस्था को लेकर असंतुष्ट है इस संस्था को तुरंत भंग कर दिया जाना चाहिए। बड़े अखबारों ने अपने यहाँ आतंरिक ऑडिट की व्यवस्था लागू कर ली है। अब छोटे अखबारों पर भी यही दबाव बनाया जा रहा है इस काम में आरएनआई और आईबी की भी हिस्सेदारी है। सरकार हमसे तय समय में रिटर्न की माँग करती है जबकि आवेदनों पर लंबे समय तक फ़ैसला नहीं लिया जाता इसलिए ऐसी व्यवस्था का निर्माण हो जिससे 30 दिनों के भीतर फ़ैसला हो।

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