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    Published On : Wed, Mar 20th, 2019
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    घटता रोजगार, बढ़ती बेकारीः चुनावी मुद्दा

    गोंदिया : ‘राइस सिटी’ में ‘राइस मिलर्स’ दुखी

    गोंदिया: बेरोजगारी देश के समुख एक प्रमुख समस्या है। पूर्वी विदर्भ का गोंदिया-गड़चिरोली जिला नक्सल ग्रस्त व आदिवासी बाहुल्य है। यहां निरंतर बढ़ती बेरोजगारों की फौज हमारी प्रगति , शांति व स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है। बात अगर गोंदिया की करें तो यहां एकमात्र बड़ा उद्योग अदानी थर्मल पावर प्लांट है जिसके 5 युनिट में 3300 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है। गोंदिया की तिरोड़ा तहसील स्थित अदानी पावर प्लांट में लगभग 3 हजार कर्मचारी काम करते है जिनमें से 80 प्रतिशत गोंदिया जिले और आसपास के ब्लॉक से है तथा 20 प्रतिशत बाहरी प्रदेशों के कर्मचारी यहां पर कार्यरित है। कोई ओर बड़ा उद्यौग जिले में न होने की वजह से तथा सरकारी नौकरियों में ना के बराबर अवसर मिलने से जिले में रोजगार के साधन काफी हद तक राइस उद्यौग उपलब्ध कराता रहा है जो अब मरणासन्न अवस्था में पहुंच चुका है।

    चूंकि अब जिले में लोकसभा चुनाव प्रचार का दौर शुरू हो चुका है तो बढ़ती बेरोजगारी भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभर रही है। विपक्षी नेता जहां मंच से मोदी सरकार को घेर रहे है वहीं सत्ता पक्ष के नेता उनसे 55 सालों का हिसाब मांग रहे है।

    राईस सिटी में चावल उद्योग मरणासन्न अवस्था में
    गोंदिया रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरते ही यात्रियों को उद्घोष सुनाई देता है ‘आपका इस चावल नगरी गोंदिया में स्वागत है’.. लेकिन देश में राईस सिटी के नाम से प्रसिद्ध गोंदिया में राईस उद्योग की स्थिति मरणासन्न अवस्था में पहुंच चुकी है। यहां के डीआईसी (डिस्ट्रिक्ट इंडस्ट्रीयल सेंटर) में रजिर्स्टड राईस मिलों की संख्या 335 है।

    गोंदिया जिला राइस मिल असोसिएशन में रजिस्टर्ड सदस्यों की संख्या 230 है। पहले जहां इस उद्योग से 2 लाख लोगों को प्रत्यक्ष- अप्र्रत्यक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध होता था अब आधे से अधिक उद्योगों पर ताला लटक जाने की वजह से इस उद्योग से 50 हजार लोगों को भी रोजगार उपलब्ध नहीं हो रहा है। हर साल 8 से 10 राईस मिलें एनपीए हो रही है अभी डीआरडी में 40 मिलों के उपर केस चल रहे है। बैकों से उद्योग स्थापित करने हेतु ली गई कर्ज और किश्त की रकम राईस मिलर्स ने भरी नहीं तो, बैंकों ने उनके खाते सीज कर दिए और उनपर जब्ती (रिकवरी) के सूट डाल दिए गए है। कुछ मिलर्स इस निर्णय के खिलाफ अपील में गए है तो गोरेगांव क्षेत्र की 2-3 राईस मिलों पर बैंक के ताले लग चुके है और प्रापर्टी कुर्क कर निलामी की प्रक्रिया चल रही है।

    गुलजार रहने वाले राइस उद्यौग में विरानी छायी
    पहले 5 राज्यों से धान मिलिंग हेतु गोंदिया आता था तो 3 शिफ्ट में राईस मिलें चला करती थी, आज एक शिफ्ट भी चलना दुर्भर है। वजह है गर्वमेंट द्वारा किसानों से 4 जिलों में 300 समर्थन मुल्य आधारित धान खरीदी केंद्र खोलकर सीधे उनकी उपज 1750 रू. प्लस 500 रू. बोनस देकर खरीदना..। आज की परिस्थिती में पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ यह 2500 रू. प्रति क्विंटल की दर किसानों को दे रहा है, 250 रू. क्विंटल का फर्क होने से जिले का धान अवैध रूप से पड़ोसी प्रदेश छत्तीसगढ़ में चला जाता है। कच्चा माल उपलब्ध न होने की वजह से जो मिलें चालू है उनमें अधिकांश सिर्फ कस्टम मिलिंग (सरकारी धान की पिसाई) कर रही है और तैयार चावल वेयर हाऊस और एफसीआई गोदामों में जमा कराया जाता है, जहां से पीडीएस राशन प्रणाली के तहत यह गरीबों के हाथों तक पहुंचता है।

    डब्ल्यूटीओ के समझौता शर्तों पर सरकार का हस्ताक्षर करने से इंकार
    मिलर्स का कहना है कि, देश में राइस उद्योग के चौपट होने की एक बड़ी वजह किसानों को दी जा रही खाद्य सब्सिडी है जिसे डब्ल्यूटीओ के नियम के तहत 25 वर्षों में कम करते हुए 10 प्रतिशत तक लाना था और 2014 मेंं इसे पूर्णतः बंद करना था लेकिन बीजेपी सरकार ने डब्ल्यूटीओ के समझौते की शर्तों पर यह कहते हुए हस्ताक्षर नहीं किए है कि, भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा यहां के किसान इस 10 प्रश. की सब्सिडी को सराइबिल नहीं कर सकेंगे।

    क्योंकि हमारे देश में धान का समर्थन मुल्य अधिक है, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हम दूसरे चावल उत्पादक देशों से मुकाबला नहीं कर पा रहे है।
    गोंदिया से पहले प्रतिवर्ष 150 रैक चावल की भरकर भेजी जाती थी एक रैक में 2600 टन (26 हजार क्विंटल) चावल आता है। अभी की स्थिती में सिर्फ 15 से 20 रैक ही भरी जा रही है। पहले गोंदिया से सालभर में 20 लाख क्विंटल चावल इंडियन मार्केट और खाड़ी तथा अफ्रिकी देशों में एक्सपोर्ट होता था , आज इसकी संख्या घटकर 8 से 10 लाख रह गई है।

    किसानों से वफा.. उद्योगों से दगा, क्यों?
    हर साल महाराष्ट्र की सहकारी क्षेत्र से जुड़ी जितनी भी गन्ना फैक्ट्रीयां है, उनके बिजली बिल माफ हो जाते है, ऋण माफ हो जाते है, अभी 2 माह पूर्व महाराष्ट्र सरकार ने वस्त्र उद्यौग का भी कर्जा माफ कर दिया है। इतना ही नहीं मध्यप्रदेश, यूपी, छत्तीसगढ़, पंजाब, महाराष्ट्र में किसानों का कर्जा माफ किया गया है तो फिर एैसे में उद्यौगों से सौतेला व्यवहार क्यों?

    अब गोंदिया जिला राइस मिलर्स ने भी मरणासन्न अवस्था में पहुंच चुके चावल उद्योगों को संरक्षण देने हेतु सरकार का ध्यान आकर्षण किया है, जब किसानों का ऋण माफ हो सकता है तो बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने वाले राइस उद्यौगों का क्यों नही? इस संदर्भ में गोंदिया, भंडारा, चंद्रपुर की राइस मिलर्स ने एकजुटता दिखाते हुए अब सरकार को निवेदन सौंप उसपर दबाव बनाने की तैयारी शुरू कर ली है।


    रवि आर्य


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