नागपुर. सरकार की ओर से 8 फरवरी 2005 को जारी किए गए नोटिफिकेशन के अनुसार केवल एक ही बार पेरोल मिलने की वकालत करते हुए सेंट्रल जेल में बंद कैदी को पुन: पेरोल देने से इंकार किया गया. जिसे चुनौती देते हुए मनीषप्रसाद गौड की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई. याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश अविनाश घारोटे ने शर्तों के आधार पर याचिकाकर्ता को 45 दिन का पेरोल प्रदान किया.

अदालत ने आदेश में कहा कि निर्धारित समय के भीतर कैदी को जेल में वापस लौटना होगा. साथ ही जेल में वापस लौटने से पहले कोरोना टेस्ट भी करनी होगी. इसी बीच यदि सरकार की ओर से जारी नोटिफिकेशन में समयावधि कम की जाती है, तो कैदी को तुरंत प्रभाव से सरेन्डर करना होगा. याचिकाकर्ता गौड की ओर से अधि. श्वेता वानखेडे और सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील एन.एस.राव ने पैरवी की.

अर्जी ठुकराना अवैध
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रही अधि. वानखेडे ने कहा कि कैदी को एक बार फर्लो पर छोड़े जाने के कारण दूसरी बार अवकाश मांगने की अर्जी ठुकराना पूरी तरह अवैध है. यहां तक कि हाईकोर्ट की मुख्य पीठ की ओर से ऐसे मामले में फैसला सुनाया है. जिसमें इमरजेन्सी पेरोल आवंटित करने का स्पष्ट उल्लेख किया गया है. इसके बावजूद जेल प्रबंधन की ओर से अर्जी ठुकराई गई. दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता के लिए असंभव कोई भी शर्त लादी नहीं जा सकती है. यहां तक कि प्रधान पीठ की ओर से ऐसे मामले में दिशा निर्देश जारी किए गए है.

समय के पहले किया सरेन्डर
जेल प्रबंधन द्वारा प्रेषित किए गए रेकार्ड का हवाला देते हुए अदालत ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता को इसके पूर्व 6 जून 2019 को फर्लों पर छोड़ा गया था. जिसमें रखी गई शर्त के अनुसार याचिकाकर्ता ने समय के भीतर ही 5 जुलाई 2019 को जेल में सरेन्डर भी कर दिया था. अत: पुराने रेकार्ड और प्रधान पीठ के फैसले को देखते हुए इमरजेन्सी फर्लों पर छोड़ा जाना तर्कसंगत होगा.