Editor in Chief : S.N.Vinod    |    Executive Editor : Sunita Mudaliar
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Published On : Fri, May 18th, 2018

कांग्रेस, भाजपा, जनादेश और नैतिकता!

BJP and Congress

कर्नाटक पर सर्वोच्च न्यायलाय के आदेश के बाद भाजपा की ओर से कहा गया कि कांग्रेस “जनादेश” को कुचल देना चाहती है।
अब स्वाभाविक सवाल कि क्या सचमुच कांग्रेस जनादेश का आदर नहीं करती? जवाब के लिए 1989 का ज्वलंत उदाहरण!

1989 के आम चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी तो बनी, लेकिन बहुमत से दूर रही।कांग्रेस को 197 सीटें मिलीं जबकि वीपी सिंह के राष्ट्रीय मोर्चा को143 और भाजपा को 85 सीटें मिली थीं।तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ये कहते हुए कि उनकी पार्टी को “जनादेश” प्राप्त नहीं हुआ है,सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया।कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत नहीं मिलने को राजीव गांधी ने “जनादेश” नहीं मिलना माना और सरकार बनाने से इनकार कर दिया।ध्यान रहे, तब मामला केंद्र में सरकार बनाने औऱ प्रधानमंत्री बनने का था।लेकिन,राजीव गांधी या उनकी पार्टी कांग्रेस येन- केन सत्ता हथियाने की नीति से दूर रही।तब क्या कांग्रेस ने जनादेश का अनादर किया था?नहीं!उन्होंने जनादेश की सही व्याख्या करते हुए,नैतिकता का प्रदर्शन करते हुए जनादेश का सम्मान किया था-सरकार बनाने से इनकार कर!फिर,भाजपा के समर्थन से वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने,सरकार बनाई।

प्रसंगवश,1996 का आम चुनाव!भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन बहुमत से दूर।भाजपा को 161 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को 140 ! राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़ी पार्टी के सिद्धांत को मानते हुए, सदन में भाजपा संसदीय दल के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई।मालूम हो, तब किसी अन्य दल ने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया था।बहुमत सिद्ध करने के लिए अटल जी को 15 दिनों का समय दिया।बहुमत के लिए पर्याप्त संख्या नहीं जुटा पाने के कारण अटल जी ने 13वें दिन ही इस्तीफा दे दिया था।तब,अटल जी और उनकी पार्टी भाजपा ने किसी खरीद-फरोख्त के हथकंडे को अपनाने से इनकार कर दिया था।

आज एक राज्य, कर्नाटक में सत्ता के लिए अनैतिकता का तांडव!बहुमत नहीं है तो सैकड़ों करोड़ में विधायकों को खरीदो!सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर विधायकों को डरा-धमका अपने पाले में लाने की कोशिशें!सबकुछ लोकतंत्र और संविधान की मूल पवित्र अवधारणा के विपरीत!देश इसे कब तक और क्यों बर्दाश्त करे?

बेहतर हो, सभी राजदल-पक्ष/विपक्ष दोनों-ऐसी अनैतिकता से बचें!अन्यथा,संयम का बांध टूट जाने पर लाचार हो जनता जब सड़कों पर उतर आएगी, तब उन्हें नियंत्रित करना संभव नहीं हो पायेगा।

और तब?????

Bebaak
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