Published On : Thu, Nov 15th, 2018

आत्मसुख की प्राप्ति माता-पिता की सेवा सेः अनुरागकृष्ण शास्त्री

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नागपुर: यदि इस धरा पर किसी भी मानव को आत्मसुख, आत्मशांति की प्राप्ति की कामना हो तो उस मानव को भगवान स्वरूप अपने माता- पिता की सेवा करनी चाहिये। उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिये। धरती पर प्रभु की चलती फिरती प्रतिमा हमारे माता- पिता ही हैं। उक्त उद्गार श्रीधाम वृंदावन के भागवत कथाकार अनुरागकृष्ण शास्त्री महाराज ने धर्मानुरागियों को श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस कहे। खंडेलवाल और सुरजन परिवार के यजमानत्व में हार्दिक लाॅन, स्माॅल फैक्टरी एरिया, वर्धमान नगर में श्रीमद् भागवत कथा ज्ञानयज्ञ 19 नवंबर तक जारी है। कथा का समय 2 से 6 रखा गया है।

कथाकार अनुराग शास्त्री ने मानव जीवन की सार्थकता को प्रकट करते हुए कहा कि भगवत सन्निधि सत्संग के माध्यम से ही प्राप्त हो सकती है। भक्ति ही सर्वोपरि है। भक्ति के माध्यम से भगवान भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। केवल भोग-विलास में लिप्त रहने वाले जीव कई कष्ट भोगते हैं और संसार में भटकते रहते हैं। भोगी जीव शांति की तलाश में घूमता है परंतु शांति कहीं नहीं मिलती क्योंकि शांति तो भौतिक सुखों से परे भगवान की शरण और भक्तों के संग में है। भक्ति के माध्यम से जीव का चित्त और जीवन पवित्र और परिमार्जित हो जाता है।

श्रीमद् भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के चतुर्थ दिवस गुरुवार को शास्त्रीजी ने श्रीमद् भागवत में वर्णित जड़भरत, भक्त प्रहलाद, भगवान नरसिंह अवतार की कथा का सरस वर्णन करते हुए बताया कि परमात्मा भगवान विष्णु ने भक्त और भक्ति की विजय सिद्ध करने के लिए सतयुग से लेकर सभी युगों में विविध रूप धारण किए हैं। जब-जब दुष्टों ने बलशाली होकर पृथ्वी को आतंकित किया है तब-तब परमात्मा ने पृथ्वी का उद्धार किया है।

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पांचवें दिवस शुक्रवार को समुद्र मंथन, वामन अवतार, भक्त चरित्र, श्रीराम अवतार और भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव होगा। सभी भक्तों से उपस्थिति की अपील की गई है।

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