
नागपुर – उत्तर नागपुर के वैशालीनगर स्थित 1966 से अस्तित्व में मौजूद सार्वजनिक उद्यान में हुए कथित अतिक्रमण पर कानून के दायरे में रहकर निर्णय लेने के निर्देश मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने जिलाधिकारी, नागपुर और आयुक्त, नागपुर महानगरपालिका को दिए हैं।
न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास की खंडपीठ ने सोमवार को जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया।
क्या है मामला?
वरिष्ठ नागरिक मुरलीधर सहारे द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि नागरिक को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के मंजूर ले-आउट में उक्त भूखंड सार्वजनिक उद्यान के लिए आरक्षित है। पिछले करीब 58 वर्षों से यह उद्यान स्थानीय नागरिकों के लिए सुबह-शाम की सैर और बच्चों के खेलने का एकमात्र सार्वजनिक स्थल है।
याचिकाकर्ता के आरोप –
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संजय करमरकर ने खंडपीठ के समक्ष पक्ष रखते हुए आरोप लगाया कि –
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की विकास निधि का दुरुपयोग कर उद्यान के बीचों-बीच दीवार खड़ी कर उसे दो हिस्सों में विभाजित किया जा रहा है।
उद्यान के उत्तरी भाग में बुद्ध विहार और दक्षिणी भाग में मंदिर के नाम पर बिना किसी वैधानिक अनुमति के पक्का निर्माण कर अतिक्रमण किया जा रहा है।
यह समूचा निर्माण महाराष्ट्र प्रादेशिक एवं नगर नियोजन अधिनियम (MRTP Act) के प्रावधानों का उल्लंघन है, जिससे उद्यान का मूल, प्राकृतिक और सार्वजनिक स्वरूप नष्ट हो रहा है।
याचिका में यह भी कहा गया कि नागरिकों द्वारा बार-बार शिकायत करने के बावजूद प्रशासन द्वारा न तो मौके का स्थल निरीक्षण किया गया और न ही अतिक्रमण पर कोई रोकथामात्मक कार्रवाई की गई।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की शिकायतों का संज्ञान लेते हुए कहा कि सार्वजनिक उद्यान के आरक्षित भूखंड पर किसी भी प्रकार का निर्माण या अतिक्रमण वैधानिक प्रक्रिया के अधीन ही होना चाहिए।
न्यायालय ने जिलाधिकारी और मनपा आयुक्त को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता द्वारा की गई शिकायतों पर महाराष्ट्र प्रादेशिक एवं नगर नियोजन अधिनियम और मनपा के संबंधित नियमों के अंतर्गत गुण-दोष के आधार पर, सुनवाई का अवसर देकर, नियमानुसार उचित निर्णय लें और विधि सम्मत कार्रवाई सुनिश्चित करें।
आदेश के साथ ही खंडपीठ ने जनहित याचिका का निपटारा कर दिया।



