
नागपुर,: भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने और विकसित राष्ट्र का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश के पास युवा शक्ति, प्रतिभा, संसाधन और उद्यमशीलता है। लेकिन क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था भी इसी गति से आगे बढ़ रही है? क्या सरकारी कार्यालयों में कामकाज की रफ्तार, जवाबदेही और उत्पादकता देश की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप है?
सामाजिक चिंतक संजय अग्रवाल ने अपने विश्लेषण में सरकारी कार्यसंस्कृति, छुट्टियों की व्यवस्था, नागरिक शिकायतों और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि समस्या केवल छुट्टियों की संख्या नहीं, बल्कि उपलब्ध कार्यदिवसों का प्रभावी उपयोग और समय पर नागरिक सेवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है।
दो भारत, दो तरह की कार्यसंस्कृति
एक ओर किसान मौसम, कर्ज और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझता है। मजदूर को रोजी-रोटी के लिए प्रतिदिन काम करना पड़ता है। निजी क्षेत्र के कर्मचारी पर लक्ष्य पूरा करने का दबाव रहता है और व्यापारी को हर दिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
दूसरी ओर, सरकारी सेवाओं में देरी, लंबित फाइलों, अधिकारियों की अनुपलब्धता और बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
यह अंतर केवल कार्यशैली का नहीं है। इसका सीधा संबंध नागरिकों के समय, कारोबार की लागत, निवेश के माहौल और आर्थिक उत्पादकता से है।
हालांकि, सभी सरकारी कर्मचारियों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा। बड़ी संख्या में कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में पूरी निष्ठा से काम करते हैं। सवाल उन व्यवस्थागत कमियों और लापरवाही का है, जिनके कारण नागरिकों को समय पर सेवाएं नहीं मिल पातीं।
सरकारी छुट्टियों का गणित क्या कहता है?
केंद्र सरकार के सामान्य प्रशासनिक कार्यालयों में शनिवार और रविवार की साप्ताहिक छुट्टियों के कारण साल में 104 दिन कार्यालय बंद रहते हैं। इसके अतिरिक्त, दिल्ली स्थित केंद्रीय सरकारी कार्यालयों के लिए वर्ष 2026 में 17 राजपत्रित अवकाश घोषित किए गए हैं।
हालांकि, इन दोनों आंकड़ों को सीधे जोड़कर कुल छुट्टियों की संख्या बताना सही नहीं होगा, क्योंकि कुछ राजपत्रित अवकाश शनिवार या रविवार को पड़ सकते हैं। राज्यों और विभिन्न विभागों की अवकाश सूचियां भी अलग-अलग होती हैं।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में त्योहारों और धार्मिक अवसरों का सामाजिक महत्व है। इसलिए छुट्टियों को समाप्त करना इस समस्या का समाधान नहीं है।
असल सवाल यह है कि उपलब्ध कार्यदिवसों में कितना काम समय पर पूरा होता है?
यदि कार्यालय समय पर नहीं खुलता, फाइलें आगे नहीं बढ़तीं, निर्णय लेने में अनावश्यक देरी होती है और नागरिकों को बार-बार बुलाया जाता है, तो अतिरिक्त कार्यदिवस भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे।
जनता के कर से चलने वाली व्यवस्था को जनता के समय और श्रम की कीमत समझनी होगी।
जवाबदेही किसकी है?
निजी क्षेत्र में काम की गुणवत्ता, समयसीमा और प्रदर्शन की समीक्षा आमतौर पर नियमित रूप से होती है। सरकारी व्यवस्था में भी मूल्यांकन और अनुशासन के नियम मौजूद हैं, लेकिन नागरिक के लिए यह जानना हमेशा आसान नहीं होता कि उसका आवेदन किस अधिकारी के पास लंबित है और देरी के लिए जिम्मेदार कौन है।
एक प्रमाणपत्र के लिए कई सप्ताह इंतजार करना, पेंशन संबंधी काम के लिए बुजुर्गों को कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ना या किसान की सहायता समय पर नहीं मिलना केवल प्रशासनिक असुविधा नहीं है। इससे लोगों का पैसा, समय और अवसर भी प्रभावित होते हैं।
समय पर कार्यालय पहुंचना, फाइल पर निर्णय लेना और नागरिकों को निर्धारित समयसीमा में सेवा देना किसी पर एहसान नहीं, बल्कि सार्वजनिक पद की बुनियादी जिम्मेदारी है।
कर्मचारी संगठनों की भी भूमिका है। कर्मचारियों के अधिकारों, उचित वेतन, पर्याप्त स्टाफ और बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग के साथ कार्यक्षमता, अनुशासन और नागरिक सेवा की गुणवत्ता पर भी जोर दिया जाना चाहिए।
आंकड़े क्या बताते हैं?
1. CPGRAMS पर एक करोड़ से अधिक शिकायतें
केंद्रीय लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) पर 2021 से फरवरी 2026 तक कुल 1,11,89,384 शिकायतें दर्ज होने का आंकड़ा दिया गया है। वर्ष 2025 में ही 22,78,256 शिकायतें दर्ज हुईं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2025 में केंद्रीय मंत्रालयों में शिकायतों के निस्तारण का औसत समय 15 दिन रहा और 82.1 प्रतिशत शिकायतें 21 दिनों के भीतर निपटाई गईं।
इन आंकड़ों को केवल प्रशासनिक विफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि शिकायतों की संख्या में सेवाओं तक बेहतर डिजिटल पहुंच और शिकायत दर्ज करने की बढ़ती जागरूकता भी भूमिका निभा सकती है। फिर भी, शिकायतों का इतना बड़ा पैमाना सेवा की गुणवत्ता, शिकायतों के प्रकार और बार-बार सामने आने वाली समस्याओं की समीक्षा की जरूरत दिखाता है।
2. सरकारी शिक्षकों की अनुपस्थिति से आर्थिक नुकसान
अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (NBER) में प्रकाशित 2014 के एक अध्ययन में भारत में सरकारी शिक्षकों की अनधिकृत अनुपस्थिति की वार्षिक वेतन लागत लगभग 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर आंकी गई थी।
यह 2014 के अध्ययन पर आधारित अनुमान है, 2026 के वास्तविक नुकसान का आंकड़ा नहीं।
अध्ययन में निगरानी बढ़ाने से शिक्षकों की अनुपस्थिति घटने के संकेत भी मिले थे। इसका महत्व केवल सरकारी वेतन के बेहतर उपयोग तक सीमित नहीं है। शिक्षक की अनुपस्थिति का असर बच्चों की पढ़ाई, पाठ्यक्रम की निरंतरता और विशेष रूप से गरीब परिवारों के बच्चों के शैक्षणिक अवसरों पर पड़ता है।
3. GDP के संदर्भ में उत्पादकता का महत्व
PRS Legislative Research की अप्रैल 2026 की समीक्षा में वर्ष 2025-26 के लिए भारत की नाममात्र GDP लगभग ₹345 लाख करोड़ अनुमानित बताई गई है।
इस आधार पर उत्पादकता में सुधार के महत्व को समझने के लिए गणितीय उदाहरण देखें:
0.1% के बराबर: ₹34,500 करोड़
0.5% के बराबर: ₹1,72,500 करोड़
1% के बराबर: ₹3,45,000 करोड़
ये आंकड़े GDP के प्रतिशत के गणितीय उदाहरण हैं। इन्हें सरकारी लापरवाही से हुए वास्तविक नुकसान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। प्रशासनिक देरी और कम उत्पादकता के वास्तविक आर्थिक प्रभाव का आकलन करने के लिए अलग, व्यवस्थित अध्ययन जरूरी होगा।
फिर भी, इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था में छोटी उत्पादकता वृद्धि भी व्यापक आर्थिक महत्व रखती है। सरकार को लंबित अनुमतियों, देरी से मिलने वाली सेवाओं और प्रशासनिक बाधाओं की लागत का अध्ययन कर सुधारों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
छुट्टी से बड़ी समस्या है काम टालने की मानसिकता
छुट्टी लेना किसी कर्मचारी का दोष नहीं है। वैधानिक और स्वीकृत अवकाश कर्मचारियों के अधिकारों का हिस्सा हैं।
समस्या तब पैदा होती है, जब छुट्टी से पहले जानबूझकर फाइलें रोक दी जाती हैं, कार्यालय खुलने के बाद भी लंबित मामलों का निपटारा नहीं होता या छोटी-सी कमी बताकर नागरिक को कई सप्ताह तक इंतजार कराया जाता है।
इसका सबसे अधिक नुकसान उन लोगों को होता है, जिनकी आजीविका रोज के काम पर निर्भर करती है। दिहाड़ी मजदूर का एक दिन का वेतन जाता है, छोटे व्यापारी का कारोबार प्रभावित होता है और किसान का जरूरी काम समय पर न होने से नुकसान हो सकता है।
इसलिए प्रशासनिक सुधार का लक्ष्य केवल कार्यालय में उपस्थिति दर्ज करना नहीं, बल्कि नागरिकों को समय पर और गुणवत्तापूर्ण सेवा उपलब्ध कराना होना चाहिए।
चुनाव, हड़ताल और आपदा के दौरान सेवाएं कैसे चलें?
चुनाव, बाढ़, कानून-व्यवस्था की स्थिति और कर्मचारी आंदोलनों के कारण प्रशासनिक कामकाज प्रभावित हो सकता है। चुनाव लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं और आपदा के समय राहत एवं बचाव कार्य सर्वोच्च प्राथमिकता रखते हैं।
लेकिन इन परिस्थितियों में भी जरूरी नागरिक सेवाओं को यथासंभव चालू रखने की व्यवस्था होनी चाहिए।
इसके लिए वैकल्पिक कर्मचारियों की तैनाती, ऑनलाइन आवेदन, अधिकृत अधिकारियों के बीच कार्य हस्तांतरण और आवश्यक सेवाओं की निरंतरता से जुड़ी स्पष्ट योजनाएं बनाई जा सकती हैं।
उद्देश्य कर्मचारियों के अधिकारों को सीमित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में नागरिक पूरी तरह असहाय न रह जाए।
प्रशासनिक सुधार के लिए आठ जरूरी कदम
1. उपस्थिति के साथ परिणामों की समीक्षा
बायोमेट्रिक उपस्थिति के साथ यह भी देखा जाए कि निर्धारित समय में कितना काम पूरा हुआ और उसकी गुणवत्ता कैसी रही।
2. प्रत्येक नागरिक सेवा की समयसीमा
प्रमाणपत्र, पेंशन, लाइसेंस और अन्य सेवाओं के लिए स्पष्ट समयसीमा तय हो। देरी होने पर कारण दर्ज किया जाए और लापरवाही की स्थिति में नियमानुसार कार्रवाई हो।
3. काम के आधार पर प्रदर्शन मूल्यांकन
वार्षिक मूल्यांकन में लंबित मामलों, समयबद्ध निस्तारण, काम की गुणवत्ता और नागरिक प्रतिक्रिया जैसे मानकों को उचित महत्व दिया जाए।
4. लापरवाही पर निष्पक्ष कार्रवाई
बार-बार अनधिकृत अनुपस्थिति, जानबूझकर फाइल रोकने या भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष जांच और नियमों के अनुसार कार्रवाई हो। संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर भी मिले।
5. बेहतर काम करने वालों को प्रोत्साहन
समय पर गुणवत्तापूर्ण काम करने वाले कर्मचारियों को सम्मान, प्रशिक्षण और करियर में आगे बढ़ने के अवसर दिए जाएं।
6. डिजिटल व्यवस्था को प्रभावी बनाना
आवेदन, भुगतान और फाइल की स्थिति ऑनलाइन उपलब्ध हो। किसी अधिकारी की अनुपस्थिति में अधिकृत वैकल्पिक अधिकारी को काम सौंपने की व्यवस्था हो।
7. छुट्टियों के दौरान जरूरी सेवाओं की निरंतरता
अवकाश व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा की जाए और जरूरत के अनुसार रोटेशन के आधार पर आवश्यक सेवाएं चालू रखी जाएं। यह सब कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हुए किया जाए।
8. विभागीय प्रदर्शन सार्वजनिक करना
प्रत्येक विभाग की वार्षिक रिपोर्ट में प्राप्त, निस्तारित और लंबित आवेदनों की संख्या, औसत निस्तारण समय और देरी के प्रमुख कारण सार्वजनिक किए जाएं।
विकसित भारत के लिए प्रशासनिक सुधार अनिवार्य
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी केवल उद्योगों, किसानों, उद्यमियों और निजी क्षेत्र की नहीं है। सरकारी संस्थानों की कार्यक्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि नीतियों को जमीन पर लागू करने, नागरिकों को सेवाएं देने और आर्थिक गतिविधियों को गति देने में प्रशासन की केंद्रीय भूमिका है।
सरकारी कर्मचारियों की आलोचना का उद्देश्य उनका अपमान करना नहीं होना चाहिए। पर्याप्त स्टाफ, बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक और जरूरी संसाधनों के बिना उनसे बेहतर परिणामों की अपेक्षा करना भी उचित नहीं है। सुधार की जिम्मेदारी सरकार, प्रशासनिक नेतृत्व और कर्मचारियों—सभी की है।
लेकिन सार्वजनिक धन से चलने वाली व्यवस्था को सार्वजनिक हित में परिणाम देने ही होंगे। कर्मचारियों को समय पर वेतन और सेवा सुरक्षा मिलनी चाहिए, तो नागरिकों को भी निर्धारित समय में सेवाएं मिलनी चाहिए।
छुट्टी अधिकार है, लेकिन लापरवाही अधिकार नहीं।
विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब प्रशासन में उपस्थिति के साथ उत्पादकता, पद के साथ जिम्मेदारी और वेतन के साथ जवाबदेही भी सुनिश्चित हो।
— संजय अग्रवाल, सामाजिक चिंतक



