
नागपुर | क्या केवल दिव्यांग होने की वजह से किसी व्यक्ति को भगवान के दर्शन से रोका जा सकता है? नागपुर में सामने आई एक घटना ने इस सवाल को समाज के सामने खड़ा कर दिया है।
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित दिव्यांग महिला अबोली जारित जब नागपुर के वर्धा रोड स्थित साई मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचीं, तो मंदिर प्रशासन द्वारा उन्हें प्रवेश से रोके जाने का आरोप लगाया गया है। व्हीलचेयर पर मौजूद अबोली जारित को “बहुत भीड़ है, बाद में आइए” कहकर मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया गया।
यह मामला केवल भीड़ का नहीं, बल्कि दिव्यांगों के प्रति संवेदनशीलता की कमी और उनके अधिकारों के प्रति उदासीन रवैये को उजागर करता है। एक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त महिला को मंदिर की सीढ़ियों पर ही रोक दिया गया, जबकि आसपास मौजूद व्यवस्था मूकदर्शक बनी रही।
यह घटना सिर्फ मंदिर प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मान, समानता और इंसानियत से सीधे जुड़ी हुई है।
इस मुद्दे पर ‘नागपुर टुडे’ से बातचीत में अबोली जारित ने कहा,
“मैं मंदिर में किसी विशेष सुविधा की मांग करने नहीं गई थी। मैं अपने राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ साई बाबा का आशीर्वाद लेने गई थी। मैं दिव्यांग हूं, लेकिन अपवित्र नहीं। मैं व्हीलचेयर पर हूं, लेकिन क्या मेरी श्रद्धा चलकर नहीं आ सकती?”
उन्होंने आगे कहा,
“जब मुझे मंदिर के दरवाजे पर रोका गया, तब शारीरिक दर्द नहीं था, मानसिक पीड़ा थी। मैं एक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता के रूप में नहीं, बल्कि एक सामान्य भक्त के रूप में अपमानित हुई। मंदिर लोगों को जोड़ने के लिए होते हैं, तोड़ने के लिए नहीं। अगर भगवान के दर पर ही दिव्यांगों के लिए जगह नहीं है, तो समाज को आत्ममंथन करने की जरूरत है। यह लड़ाई सिर्फ मेरी नहीं है, कल मेरी जगह कोई और भी हो सकता है।”
समाज के सामने बड़ा सवाल
“सभी समान हैं” की बात करने वाले समाज में आज भी दिव्यांग व्यक्तियों को बुनियादी सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ता है, यह इस घटना से साफ हो जाता है। सवाल अब सिर्फ मंदिर प्रशासन का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है।
अगर पूजा स्थलों में ही इंसानियत और संवेदनशीलता नहीं होगी, तो फिर वह कहां मिलेगी?








