Published On : Fri, Jul 13th, 2018

राज्य के 14 जिले के 29000 किसान निराशा की चपेट में!

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नागपुर: जी हां! यह खुलासा राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर दीपक सावंत ने किया है. मानस उपचार के लिए सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले किसानों का आंकड़ा 29 हजार तक पहुंच चुका है. और वह भी केवल पिछले 2 वर्षों में यह जानकारी हलकान करनेवाली और कहीं ना कहीं अन्नदाता की बेचारगी दर्शाने वाली जरूर है.

प्रचंड मानसिक तनाव के चलते 22565 निराशा की गर्त में पहुंच चुके थे. इन पर महीनों इलाज किया गया, लेकिन 6366 किसान इतने ज्यादा हताश थे कि उन्हें अस्पताल में दाखिल करने के बाद ही उन पर इलाज किया जा सका. मानसिक तनाव की चपेट में राज्य के किसानों की यह हिला देने वाली संख्या खुद महाराष्ट्र सरकार ने विधान परिषद में प्रस्तुत की है.

विदर्भ मराठा उत्तर महाराष्ट्र के हजारों किसान फसलों की बीमारी मौसम का कहर लागत मूल्य का मुआवजा भी ना मिलना बैंक को निजी कर्ज की अधिकता, दूसरा पर्यायी कोई व्यवसाय ना होना आदि अनेक कुछ कारणों के चलते हमारे अन्नदाता किसान निराशा की गर्त में डूबता चला जा रहा है.

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आरोग्य मंत्री डॉक्टर सावंत ने बताया कि निराशा में डूबे हुए इन किसानों पर शास्त्रीय पद्धति से उनका वर्गीकरण कर सरकारी अस्पतालों में समुपदेशन के साथ उनका इलाज किया जा रहा है. साथ ही साथ आशा सेविकाओं के माध्यम से घर-घर जाकर भी निराशा में डूबे हुए किसान और उनके परिवारों को इलाज पहुंचाया जा रहा है. प्रेरणा अभियान अंतर्गत अप्रैल 2016 6 मार्च 2018 इन 2 वर्षों में 29000 किसान मानसिक इलाज कराने अस्पताल पहुंचे हैं.

पिछले 4 वर्षों में 13000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं और अगर बात करें इस वर्ष जनवरी से लेकर जून तक केवल 6 माह में 1307 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इस हिसाब से पिछले 6 महीने में रोजाना 7 किसानों ने निराश हो कर आत्महत्याएं की हैं.
बड़ा सवाल यह भी है यदि सरकार द्वारा प्रेरणा अभियान के तहत ईमानदारी से काम किया गया होता तो यह पिछले 6 महीने में दिल दहला देने वाले ये आंकड़े सामने नहीं आए होते.

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क्या है किसानों की निराशा का कारण
सामाजिक समस्या
आर्थिक समस्या
पारिवारिक कलह
कर्ज की अधिकता
कर्ज न मिलना
व्यसन और गलत आदतें
बीमारी की हताशा

आज भी विदर्भ मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र के हजारों किसान मानसिक तनाव की चपेट में हैं. प्रकृति से लड़कर कड़ी मेहनत कर अपने खेतों में फसल उगाते हैं पर उसकी सब्जी भाजी फल और अनाज को कौड़ियों का भी भाव नहीं मिलता जिससे वह टूट जाता है सरकार की मदद भी जमीनी स्तर पर नहीं मिल पाती. इसी के चलते यह अन्नदाता खुद को अकेला असहाय कमजोर और टूटा हुआ मानकर जीने से अच्छा मौत की राह को चुनता नजर आता है.

By Narendra Puri

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