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    Published On : Mon, Oct 20th, 2014

    अब उबरने की चाहत हो तो युवाओं को सौंप दो कमान

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    कांग्रेसी “थिंक टैंक” की मंशा  

    नागपुर टुडे : नागपुर,विदर्भ सहित सम्पूर्ण राज्य  में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया,इसके लिए अब कोई उदहारण देने की जरुरत समझा जाना गलत होगा,जिसे रविवार १९ अक्टूबर को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का परिणाम ने साफ-साफ अंकित कर दिया है.

    यह भी कड़वा सत्य है कि वर्षो तक चल निकली राजनीत में खुद को व्यस्त रखने वाले नागपुर से लेकर मुंबई,मुंबई से लेकर दिल्ली तक कांग्रेसी आज २० अक्टूबर को पूर्णतः खाली-पिली हो गए है.इन कांग्रेसी नेताओं की सोच,रहन-सहन का स्तर इतना आलीशान है कि अगले ५ वर्षो तक जमीनी स्तर पर लगातार मेहनत कर राजनीति में बनाये रखना नामुमकिन साबित होगा।हारे कांग्रेसी दिग्गजों को कोई खास गम भी नहीं है अगले २-५ दिन जिनसे समर्थन माँगा था और उसने दिया या न दिया उसे कोसते हुए दीपावली पर्व काट लेंगे ताकि कोई दीपावली के नाम पर हाथ पसारे चंदा या उधारी मांगने वालो सके.सबसे खास बात कोंग्रेसियो में यह थी कि वर्षो तक सत्ताधारी रहने के बावजूद उनमें “स्पोर्टिंग स्प्रिट” नाममात्र की भी नहीं देखी गई.कि हार के बावजूद प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जीतने वाले को मुबारकबाद देकर क्षेत्र में खुद का सम्मान बनाये रखे.अब तो सम्पूर्ण कांग्रेस को कोंग्रेसियो की बहन प्रियंका सहित नई पीढ़ी  के हाथों सौप दिया जाना समय की मांग है.वार्ना “मोदी वेव” अगले चुनाव तक ऐसी हालात पैदा कर देगी कि कांग्रेस एक आंकड़ा तक सिमट जाएगी,आखिर उनके पास रामबाण जो है.

    सतीश,अनीस अब कभी चुनाव न लड़े तो अच्छा
    सतीश एक वक़्त जिले के दबंग नेता थे.अपनी चलती समय में सिर्फ पूर्व नागपुर व जाति विशेष का कुछ ज्यादा ध्यान रखने में सभी सभी जायज सवालो सह मुद्दो को नाजायज साबित किया।इनके अलावा कांग्रेस को १% तो खुद का १११% भला कर इतना फ़ैल गए कि उन्हें उठने में जान घबराने लगी। उनकी राजनीति पूर्व नागपुर से शुरुआत हुई और पूर्व नागपुर में ही अस्त हो गई.रही सही कसर दक्षिण नागपुर ने हार का दक्षिणा देकर हमेशा के लिए घर बैठा दिया।पिछले हार के बाद ३.५ साल बाद सार्वजानिक राजनीति में आये थे,इस हार ने उन्हें कही का नहीं छोड़ा.

    दूसरी और जिंदगी भर बचपन से लेकर आजतक हर क्षेत्र में स्विमिंग करते रहे.इस चक्कर में न ठीक से छत और न जमीन बना पाये। कांग्रेस नेता का दत्तक पुत्र बन नागपुरी जनता-मतदाता के जज्बात से खेलते रहे.इसलिए ठान कर बैठी जनता ने पिछले साल पश्चिम तो इस दफे मध्य से हरवाकर घर ही बैठा दिया।सबसे खास बात अनीस की यह रही कि इनका जबान बड़ा मधुर था कोई भी आकर्षित कर जाता था,इसलिए कोई नहीं चाहता था कि नागपुर सह अपने विधानसभा क्षेत्र से दूर जाये,इसलिए घर बैठना ही अंतिम पर्याय था.

    उक्त दोनों की खासियत यह थी कि दोनों ने अपना उत्तराधिकारी बनाने की कभी कोशिश नहीं की.इस हिसाब से दोनों कांग्रेसी का राजनैतिक कॅरियर पूर्णतः अस्त हो चूका है.इन्हे पार्टी ने क्रमशः सेवादल व सेल की जिम्मेदारी देकर इनको पार्टी से बनाये रखना चाहिए.

    नई पीढ़ी को तैयार करे बुजुर्ग कांग्रेसी
    नागपुर जिले के हारे सह पुराने कोंग्रेसियो ने अपना बड़ा दिल कर अपने परिजन सह सक्षम युवाओं को आगे बढ़ने के लिए आज से ही शुरुआत करना चाहिए,ताकि आगामी लोकसभा सह विस-विप् चुनाव के लिए युवाओं की अनुभवी,अध्ययनशील फ़ौज तैयार हो सके.कोंग्रेसियो के लिए यह पहल काफी दुखदाई होगी,कि वे खुद अपनी पैर पर कुल्हाड़ी मार ले.कांग्रेसी परंपरा यह है कि एक दफे कैसा भी पदाधिकारी बन जाने पर उसका “लेटर हेड” जिंदगी भर खपाते है.कांग्रेस ने नई पीढ़ी को पार्टी की कमान प्रियंका गांधी को सौंप सम्पूर्ण देश में अनिवार्य नई प्रथा की शुरुआत करना चाहिए. वही नागपुर में कांग्रेसी बुजुर्ग नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रो की कमान क्रमश: दुष्यंत चतुर्वेदी,बंटी शेळके,दीक्षा राऊत,विशाल मुत्तेमवार,कुणाल राऊत,गज्जू यादव,सचिन किरपान,अनिल राय,कुंदा राऊत आदि के हाथों अभी से ही सौपा जाना कांग्रेस हिट में समय की मांग है.

    १५  दिन पहले उम्मीदवार घोषित होती २ सीट बढ़ सकती थी
    राजेंद्र मूलक  कामठी और अभिजीत वंजारी को पूर्व से लड़ने का आभास कांग्रेस ने पहले करवा दिया होता तो दोनों सीटों पर और रोचक मुकाबला नज़र आता.मूलक ने पश्चिम तो वंजारी ने दक्षिण की तैयारी कर रखी थी.ऐन वक़्त पर दोनों की टिकट उनके इच्छुक विस क्षेत्र से काट कर अन्य क्षेत्र में लड़ने को मजबूर किये जाने  बावजूद भी परफॉर्मेंस अच्छा रहा.यही १५ दिन पहले उम्मीदवारी घोषित हुई होती तो क्षेत्र को जानने और कार्यकर्ता को समझने का समय मिल गया होता। फिर परिणाम भी कांग्रेस के पक्ष में आने की संभावना बढ़ गई होती। अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है,अब उन्हें पुनः ५ साल समझने-जानने का अवसर मिल गया है,क्षेत्र के प्रति सकारात्मक रुख रही तो उन्हें भी मतदाता वहां पहुंचा सकती है,जहाँ वे पहुंचना चाहते है.

    द्वारा:-राजीव रंजन कुशवाहा

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