Published On : Wed, Apr 2nd, 2014

रामटेक लोकसभा : शायद ही लग पाए मुकुल की नैया पार

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mukul-washnikनागपुर –
बुलढाणा से नकारे गए अ. भा. कांग्रेस समिति के महासचिव और रामटेक लोकसभा के निवर्तमान सांसद मुकुल वासनिक को इस बार का लोकसभा चुनाव काफी भारी पड़नेवाला है. वैसे भी रामटेक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र की यह खासियत रही है कि वह किसी को भी दोबारा मौका नहीं देता. फिर मुकुल तो अपने 5 वर्ष के कार्यकाल में 1500 दिन इलाके से गायब ही रहे हैं. रामटेक के मतदाताओ का मानना है कि क्षेत्र के लिए उल्लेखनीय कार्य करने वाला ही उनका दोबारा प्रतिनिधित्व कर सकता है, फिर वह किसी भी पार्टी का क्यों न हो.

दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका

सूत्र बताते हैं कि मुकुल के लिए अपने कार्यकर्ताओं की भी कोई अहमियत नहीं होती. पिछले चुनाव में अहम् भूमिका निभानेवाले कार्यकर्ताओं को उन्होंने दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका. ऐसे कार्यकर्ता आज तक संभल नहीं पाए हैं. सूत्रों के अनुसार जीतकर आने के बाद रामदासपेठ स्थित एक प्रिंटिंग प्रेस के परिसर में जो जलसा आयोजित किया गया था उसमें भी उन लोगों को आमंत्रित किया गया जिन्होंने चुनाव के दौरान ज्यादा खर्च दिखाया था. बाद में भी वे प्रेस वाले परिवार पर इतना मेहरबान रहे कि अपने पूरे कार्यकाल में सबसे ज्यादा राजनैतिक लाभ उन्हें ही पहुंचाया. जलसे में समाचारपत्र समूह के मुखिया को आमंत्रित किया गया था. इस समूह ने चुनाव की सारी खबरें पैसा लेकर ही छापी थी.

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कड़ी मेहनत करने वालों को दिखाया ठेंगा

सूत्र कहते हैं कि मुकुल ने पिछले चुनाव में सारी प्लानिंग करनेवाले कार्यकर्ताओं को भी चुनाव जीतने के बाद ठेंगा दिखाया. उनसे मिलने दिल्ली जानेवालों को यह कहकर लौटा दिया गया कि समय लेकर क्यों नहीं आए. चुनाव के दौरान सूचनाएं मुहैया करनेवाले पत्रकारों को मेहनताना देना तो दूर, उन्हें कहीं समाहित तक नहीं किया गया. मुकुल ने कभी अपने कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं की, जबकि इलाके के विधायक उनकी सहायता करते रहे. कार्यकर्ता इसीलिए हमेशा नुकसान में रहे. इलाके के विधायकों से भी कभी उनकी बनी नहीं. कभी मुकुल के करीबी रहे कार्यकर्ताओं ने
चर्चा में बताया कि जो भी जज्बाती और मेहनतकश कार्यकर्ता खुद होकर मुकुल से जुड़ना चाहता है उसे मुकुल मजबूर समझते हैं.
दूसरी ओर फरेबी, धोखेबाज, निकम्मे और लंबी-लंबी फेंकनेवालों को सिर पर बिठाए घूमते हैं. इसी का नतीजा कि सालों से दिल्ली में चिपके रहने के बावजूद मुकुल राष्ट्रीय नेता या दलित नेता नहीं बन पाए. लगता है कि उन्हें दलित शब्द से ही चिड़ हो.

दिल्ली में बने रहने की इच्छा

कार्यकर्ता बताते हैं कि हर बार की तरह चुनाव लड़ने से भागने वाले मुकुल ने इस बार भी चुनाव न लड़ने की इच्छा जताई थी, लेकिन
हाईकमान नहीं माना और उन्हें चुनाव लड़ने भेज दिया. बताते हैं की मुकुल ने हाईकमान को समझाने की कोशिश की थी कि वह वर्ष में 10 महीने तो दिल्ली में रहते हैं. पार्टी का काम अधिक होने के कारण वे अपने क्षेत्र में काम भी नहीं कर पाते हैं. इसलिए उनका चुनाव जीतना मुश्किल है. बताते हैं कि मुकुल ने कांग्रेस समिति में ही बने रहने की इच्छा जताई थी.

बालकृष्ण वासनिक के किराएदार पर लाखों का संपत्ति कर बकाया

मुकुल के एक करीबी के अनुसार वे खुद को बड़ा साफ-सुथरा बताते है, लेकिन बड़े-बड़े मामलो में उनका नाम उछल ही जाता है. फिर चाहे तंदूर कांड हो या सहकारी क्षेत्र का शेयर घोटाला. कांग्रेस का टिकट वितरण विवाद हो या उनका बैचलर होना. इस बार जहां इनका प्रचार कार्यालय है, वह परिसर मुकुल के पिता बालकृष्ण वासनिक का घर है. इस मकान के ऊपरी हिस्से का उपयोग व्यावसयिक तौर पर किया जाता है. यहां दो किराएदार हैं और दोनों पर लाखों का संपत्ति कर बकाया है. मनपा प्रशासन मुकुल के डर से ही संपत्ति कर वसूल नहीं कर पा रहा है. मनपा की कार्रवाई होने पर संपत्ति जब्त करने की नौबत आ सकती है.
भीड़ से नफरत

रामटेक के एक कांग्रेसी नेता ने बताया कि मुकुल को सबसे ज्यादा भीड़ से नफरत है. चाहे नागपुर में हो या दिल्ली में. चुनाव जीतने के बाद कार्यकर्ता, कांग्रेसी, मित्र, सहयोगी, फाइनेंसर आदि समय-समय पर जब भी दिल्ली पहुंचे तो किसी को डांटकर भगा दिया गया तो किसी को गुमराह कर. किसी-किसी को तो बिना मिले ही भगा दिया गया. शायद इनमे से कोई फिर दोबारा उनसे मिलने गया हो.

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