Published On : Sat, Oct 19th, 2019

21 को मतदान.. कौन मारेगा मैदान

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गोंदिया: आज शाम को थम जाएगा चुनाव प्रचार का भोंपू

गोंदिया: सोशल मीडिया से लेकर आम जनता के बीच इन दिनों यह जनचर्चा बनी हुई है कि, गोंदिया विधानसभा का चुनाव इस बार जनता लड़ रही है? सोचने वाली बात है, चुनाव तो उम्मीदवार लड़ता है फिर जनता कैसे लड़ेगी?

हम इसी विषय को लेकर जमीनी हकीकत जानने के लिए रियलिटी टेस्ट करने शहर से लेकर कई ग्रामीण इलाकों के दौरे पर निकले। इस बार चुनावी फ़िजा कुछ बदली-बदली सी है। 10 में से 7 लोग परिवर्तन चाहते है, अब यह परिवर्तन कैसा होगा? और किसे जीत दिलाएगा? यह तो पब्लिक का वोट तय करेगा? अलबत्ता इतना जरूर है चुनावी रिजल्ट किसी चौंकाने वाले परिणाम की ओर इशारा कर रहे है?

प्रचार में चुनाव चिन्ह का होता है बड़ा महत्व..

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किसी भी चुनाव में पार्टी सिम्बाल का बड़ा महत्व होता है, राष्ट्रीय पार्टियों के चुनाव चिन्ह तो मतदाताओं के जहन में रचे बसे रहते है लेकिन पहली बार गोंदिया सीट पर यह देखने को मिल रहा है कि, किसी निर्दलीय प्रत्याशी का चुनाव चिन्ह मतदाताओं के मन-मस्तिष्क पर छाया हुआ है, जो अपने आप में आश्‍चर्यजनक है।

गौरतलब है कि, 4 को नामांकन भरे गए, 7 को सिम्बाल आंबटित किए गए, महज 10 से 12 दिनों के भीतर निर्दलीय प्रत्याशी के सिम्बाल का इस कदर मुक प्रचार खुद जनता द्वारा किया गया है कि, अब हर मतदाता के जहन में यह चिन्ह घर कर गया है। इसी से कयास लगाए जा रहे है कि, इस बार चुनाव उम्मीदवार नहीं, जनता लड़ रही है ?

एक भी बड़े नेता की रैली नहीं हुई
भाजपा कार्यकर्ताओं को इस बात का बेहद अफसोस है कि, पार्टी ने टिकट तो दे दिया लेकिन हर चुनाव में प्रत्याशी को जीताने के लिए बड़े नेताओं की रैलियां होती है जिसके बाद कार्यकर्ता काम पर लग जाते है, लेकिन यह पहली बार देखने को मिल रहा है कि कोई भी बड़ा नेता प्रचार सभा हेतु गोंदिया नहीं आ रहा है, न मुख्यमंत्री की सभा हुई, न केंद्रीय मंत्री नितीन गड़करी की.. पालकमंत्री फुके तुमसर के प्रत्याशी के लिए तो प्रचार करने पहुंचे लेकिन गोंदिया को उन्होंने नजर अंदाज कर दिया यहां तक कि सांसद सुनिल मेंढे जिनके पास समय ही समय है, वे भी गोंदिया प्रत्याशी से किनारा किए हुए है एैसे में संदेश साफ है..साथ रहकर भी, साथ न निभाना..?

अब बड़े नेताओं के प्रचार में न उतरने का नुकसान किसे होगा और फायदा किसे? इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है?

साथ दिख रहे , पर साथ नहीं..
वो कहते है न पार्टी आलाकमान का एक निर्णय सारे समीकरण ही गड़बड़ा देता है, टिकट वितरण के बाद कुछ एैसे ही हालत गोंदिया विधानसभा सीट पर बन चुके है, जहां एक साथ घुम रहे और दिख रहे कार्यकर्ता भी दिली रूप से साथ नहीं.., जनता की तो बात ही निराली है वह तो परिवर्तन पर आमदा दिखायी पड़ती है।

आता.. माझी सटकली !!
मौजुदा दौर की चुनावी तस्वीर ने अच्छे-अच्छों को घनचक्कर बना डाला है। कार्यकर्ता तो खुले आम कहता है आता.. माझी सटकली!
खुद को पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता बताने का दम भरने वाली भगवा बिग्रेड के 80 प्रतिशत कार्यकर्ता निर्दलीय उम्मीदवार के लिए वोट मांगते घुम रहे है।
वर्षों से पंजे का प्रचार करने वाले कुछ कार्यकर्ता और समर्थक फूल के लिए… तथा घड़ी के कार्यकर्ता और वोटर पंजे के लिए वोट मांगते ऩजर आ रहे है और इन सबों के बीच शिवसैनिक इस बात को लेकर चिंताग्रस्त है कि, अगर इस सीट पर कमल खिल गया तो भविष्य में शिवसेना की टिकट दावेदारी ही खत्म हो जाएगी?

सेव मेरिट-सेव नेशन मूमेंट चलाने वाले पदाधिकारियों की चिंता यह है कि, अगर 25 हजार के निर्धारित लक्ष्य के आंकड़े को नोटा के बटन ने नहीं छुआ तो चुनाव परिणाम पश्‍चात उनके सारे आंदोलन की हवा निकल जाएगी? और ढूंढे से कार्यकर्ता नहीं जुड़ेंगे तथा पदाधिकारियों की साख पर भी बट्टा लग जाएगा। इतने सारे इफ-बट और किन्तु-परंतु के बीच चुनावी प्रचार का घमासान अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है ।
देखना दिलचस्प होगा, धनशक्ति के आगे जनशक्ति घुटने टेकती है या फिर परिवर्तन की सुनामी चलेगी ?

गोंदिया सट्टा बाजारः दोनों का भाव 90
सट्टा बाजार के विषय में कहा जाता है कि इस धंधे से जुड़े सट्टोरियों की पैठ शहर से लेकर गांव के अंतिम शोर के अंतिम व्यक्ति तक होती है और सारे समीकरण टटोलने के बाद ही वे भाव खोलते है? हालांकि भारत में सट्टा गैरकानूनी है लेकिन फिर भी यह उतना ही सच है कि, यह कानून की ऩजरों में धूल झोंककर खेला जाता है।

सट्टोरियों की मानें तो गोंदिया सीट पर बेहद करीबी मुकाबला है और टक्कर बराबरी की है लिहाजा दोनों का भाव 90 पैसे चल रहा है।

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