Published On : Tue, Jun 5th, 2018

वैचारिक आदान-प्रदान का बेजा विरोध

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नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षण वर्ग के समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के नाते आने के लिए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी ने अपनी स्वीकृति दी है। इससे देश के राजनीतिक गलियारों में हलचल है। डॉ. मुखर्जी एक अनुभवी और परिपक्व राजनेता हैं। संघ ने उनके व्यापक अनुभव और उनकी परिपक्वता को ध्यान में रखकर ही उन्हें स्वयंसेवकों के सम्मुख अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया है। वहां वह भी संघ के विचार सुनेंगे। इससे उन्हें भी संघ को सीधे समझने का एक मौका मिलेगा। विचारों का ऐसा आदान-प्रदान भारत की पुरानी परंपरा है, फिर भी उनके नागपुर जाने का विरोध हो रहा है। यदि विरोध करने वालों का वैचारिक मूल देखेंगे तो आश्चर्य नहीं होगा। भारत का बौद्धिक जगत उस साम्यवादी विचारों के ‘कुल’ और ‘मूल’ के लोगों द्वारा प्रभावित है, जोपूर्णत: अभारतीय विचार है। इसीलिए उनमें असहिष्णुता और हिंसा का रास्ता लेने की वृत्ति है। साम्यवादी भिन्न विचार के लोगों की बातें सुनने से न केवल इन्कार करते हैं, अपितु उनका विरोध भी करते हैं।

आप यदि साम्यवादी विचार के नहीं तो आपको दक्षिणपंथी ही होना चाहिए और आप निषेध और निंदा करने लायक हैं। वे आपको जाने बिना आपका हर प्रकार से विरोध करेंगे और उदारता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र की दुहाई देते भी नहीं थकेंगे। अकारण झूठ बोलना और दंभ उनके स्वभाव में है। कुछ वर्ष पूर्व संघ के ऐसे ही कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध समाजसेवी और सर्वोदयी विचारक डॉ. अभय बंग नागपुर आए थे। तब महाराष्ट्र के साम्यवादी और समाजवादी विचारकों ने उनका विरोध किया था। समाजवादी विचारों वाले पुणे के मराठी साप्ताहिक ‘साधना’ में उनके खिलाफ अनेक लेख प्रकाशित हुए। डॉ. बंग का कहना था कि वहां जाकर भी मैं अपने विचार रखने वाला हूं, फिर यह विरोध क्यों? मेरा सर्वोदय से संबंध जानते हुए भी संघ के लोग मुझे बुला रहे हैं और उदारता की दुहाई देने वाले समाजवादी विचार वाले मित्र मेरा विरोध कर रहे हैं। इससे तो उनकी वैचारिक संकीर्णता ही स्पष्ट हो रही है। विरोध के बावजूद वह कार्यक्रम में आए।

उन्होंने अपना भाषण लेख के रूप में ‘साधना’ साप्ताहिक भेजा, क्योंकि उसी में उनके विरुद्ध अनेक लेख प्रकाशित हुए थे, परंतु ‘साधना’ के संपादक ने उनका लेख प्रकाशित नहीं किया। साम्यवादी लोग विचारों के आदान-प्रदान में विश्वास ही नहीं रखते, क्योंकि आप उनसे असहमत नहीं हो सकते। 2010 में केरल में साम्यवादी ट्रेड यूनियन नेता केशवन नायर से मेरी भेंट हुई थी। उन्होंने ‘वेदों में विज्ञान’ विषय पर दो लेख लिखे तो उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद उन्होंने कम्युनिज्म पर अनेक लेख लिखे। उन पर आधारित पुस्तक ‘बियांड रेड’ के आवरण पर उन्होंने लिखा, ‘कम्युनिज्म तुम्हें केवल एक ही स्वतंत्रता देता है और वह है उनकी प्रशंसा करने की स्वतंत्रता।’ पश्चिम बंगाल में जब कम्युनिस्ट शासन था तब संघ के प्रचार प्रमुख के नाते मेरा कोलकाता जाना हुआ। वहां के पांच प्रमुख समाचार पत्रों के संपादकों के साथ अनौपचारिक बातचीत का कार्यक्रम बना। कम्युनिस्ट विचार के पत्र को छोड़कर सभी ने समय दिया और उनसे अच्छी चर्चा भी हुई। इन सबके संघ के विचारों से सहमत होने की हमारी अपेक्षा नहीं थी, फिर भी उन्होंने संघ के विचार सुने।

कम्युनिस्ट विचार वाले पत्र के संपादक ने यह कह कर मिलने से इन्कार किया कि मुझे समय नहीं गंवाना। मैंने संघ कार्यकर्ताओं से कहा कि ऐसी वृत्ति सर्वथा अलोकतंत्रिक है, लेकिन जब-जब मैं कोलकाता आऊं तब-तब उनसे मिलने का समय मांगना। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में दत्तात्रेय होसबले और मुझे संघ की बात रखने के लिए निमंत्रण मिला। हमने जाने का निर्णय लिया तो साम्यवादी मूल के कथित विचारकों ने विरोध किया। सीताराम येचुरी और एमए बेबी ने इसका बहिष्कार केवल इसलिए किया कि वहां संघ को अपनी बात कहने के लिए मंच दिया जाएगा। जिस संघ के विचार को सभी राज्यों में लोग स्वीकार कर रहे हैं उसे अपनी बात कहने का भी अवसर न देने वाले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं। उन्हें आशंका है कि यदि सब लोग संघ की सच्चाई जान लेंगे तो कम्युनिस्टों ने उसके विरुद्ध जो दुष्प्रचार चलाया है उसकी पोल खुल जाएगी। इससे विपरीत भी एक अनुभव है। कुछ वर्ष पूर्व कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का प्रतिनिधिमंडल भारत आया तो उसने संघ के लोगों से मिलने की इच्छा व्यक्त की।

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उसके सदस्य दिल्ली में संघ कार्यालय-केशव कुंज आए। मुझे उन्होंने चीन की प्रसिद्ध दीवार का स्मृति चिन्ह भेंट किया। मैंने प्रश्न किया कि आप एक राजकीय पार्टी के सदस्य हैं। भारत आकर विविध राजनीतिक दलों से मिलना तो समझ में आता है, लेकिन संघ से क्यों मिल रहे हैं? उन्होंने कहा, ‘हम एक कैडर आधारित पार्टी हैं और आप एक कैडर आधारित संगठन इसलिए हम विचारों के आदान-प्रदान हेतु आए हैं।’ मैंने कहा, ‘यह तो सच है, लेकिन हममें और आपमें एक मूलभूत अंतर है। आप राज्यसत्ता के लिए और राज्यसत्ता के द्वारा कार्य करते हैं। हम न तो राज्यसत्ता के लिए और न ही राज्य सत्ता के द्वारा कार्य करते हंै।’ हम सहजता से मिले, क्योंकि यही भारतीय परंपरा है। भारत के वैचारिक जगत में कम्युनिस्ट विचारों का वर्चस्व होने के कारण और कांग्रेस सहित अन्य प्रादेशिक एवं जाति आधारित दलों के पास स्वतंत्र चिंतकों के अभाव या उनके कथित चिंतकों में कम्युनिस्ट मूल के लोग होने के कारण वे उदारता, मानवता, लोकतंत्र, सेक्युलरिज्म आदि जुमलों का उपयोग करते हुए कम्युनिस्ट वैचारिक असहिष्णुता का परिचय कराते रहते हैं।

संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया के उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता से घनिष्ठ संबंध थे। एक बार गुरुजी के प्रयाग आगमन पर प्रतिष्ठित नागरिकों के साथ चाय-पान का आमंत्रण मिलने पर उन्होंने रज्जू भैया से कहा कि मैं आना चाहता हूं, लेकिन नहीं आऊंगा, क्योंकि कांग्रेस में मेरे बारे में अनावश्यक चर्चा शुरू होगी। इस पर रज्जू भैया ने उनसे कहा, हमारे यहां तो एकदम अलग सोच है। यदि कोई स्वयंसेवक मुझे आपके साथ देख लेगा तो वह मेरे बारे में शंका नहीं करेगा। वह तो यह सोचेगा कि रज्जू भैय्या उन्हें संघ के बारे में समझा रहे होंगे। क्या कांग्रेसियों को प्रणबदा जैसे कद्दावर नेता पर भरोसा नहीं है? प्रणबदा की तुलना में कहीं कम अनुभवी कांग्रेसी नेता उन्हें नसीहत क्यों दे रहे हैं? किसी स्वयंसेवक ने यह क्यों नहीं पूछा कि इतने पुराने कांग्रेसी नेता को हमने क्यों बुलाया है? संघ की वैचारिक उदारता और संघ आलोचकों की सोच में वैचारिक संकुचितता, असहिष्णुता और अलोकतांत्रिकता का यही फर्क है। भिन्न विचार के लोगों में विचार-विमर्श भारत की परंपरा है। विचार विनिमय के विरोध की वृत्ति तो अभारतीय है। प्रणबदा के संघ के आमंत्रण को स्वीकारने से देश के राजनीतिक-वैचारिक जगत में जो बहस छिड़ी उससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती लोगों का असली चेहरा सामने आ गया। यह एक अच्छा संकेत है कि प्रणबदा ने तमाम विरोध के बावजूद नागपुर आने का मन बनाया और यह भी कहा कि वह सारे सवालों का जवाब वहीं देंगे। हम प्रणबदा का और उनकी इस दृढ़ता का स्वागत करते हैं।

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