Published On : Mon, Jan 16th, 2017

राजमार्ग की सूची से हटाकर शराब दुकानें बचाने का षड्यंत्र

liquor

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नागपुर: विगत वर्ष दक्षिण भारत में राजमार्ग पर दुर्घटना हुई, दुर्घटना का कारण शराब को ठहराया गया। इस दुर्घटना को लेकर सर्वोच्च न्यायलय में मामला चला, जिसमें न्यायमूर्ति ने उक्त मामले की गंभीरता को देखते हुए सम्पूर्ण देश के राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय राजमार्गों से शराब दुकानें हटाने का आदेश सरकार को दिया। एक तरफ सभी राज्यों की आबकारी विभाग राज्यमार्गों से शराब दुकानें हटाने संबंधी सूची बनानी शुरु की तो दूसरी ओर शराब दुकानदारों की पहल पर चिन्हित राजमार्गों को ही ख़त्म करने और वहां स्थित शराब दुकानों को स्थानीय प्रशासन के तहत दिखाने की सक्रियता तेज गति से शुरु होने की जानकारी मिली है।

सर्वोच्च न्यायालय के उक्त आदेश पश्चात नागपुर स्थित विभागीय आबकारी विभाग ने लंबी-चौड़ी फेरहिस्त तैयार की, इस क्रम में जिले के सैकड़ों शराब दुकानों की सूची बनाई।नागपुर से लगे तीन राजमार्गों पर लगभग 450 बीयर बारों सहित सैकड़ों होटल हैं। जहां वैध-अवैध रुप से शराब बिक्री और पीने की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी राज्य उत्पादन शुल्क विभाग के आयुक्त ने सभी जिला अधीक्षकों को पत्र भेजकर राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से शराब बेचने और पिलाने वालों की जानकारी मांगी है।

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तो दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सक्रिय जिला आबकारी विभाग के गंभीर पहल से शहर व जिले के शराब व्यवसायी सकपका गए। इनके प्रतिनिधि ने विगत सप्ताह एनवीसीसी की कार्यकारिणी सभा में संकट से जूझ रहे शराब व्ययवसायियों को संगठन द्वारा मदद करने की गुहार लगाई, मांगकर्ता ने उपस्थितों को बताया कि उक्त आदेश सुको के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया है, इसलिए इस मामले में हर कोई हाथ डालने से हिचकिचा रहा है। संगठन के प्रतिनिधि ने कहा कि यदि शहर से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की अधिसूचना समाप्त कर दी जाए तो अपने आप उन मार्गों की शराब दुकानें स्थानीय प्रशासन के अधीन स्थित सड़क मार्गों पर मानी जाएंगी और इससे सैकड़ों शराब दुकानों को पुनर्जीवन मिल जाएगा।

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उल्लेखनीय यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन कर शराब विक्रेताओं के द्वारा दिए गए लालच के झांसे में आकर सरकारी अधिकारियों ने कमर कस ली है और चिन्हित सड़कों को राजमार्ग की सूची से हटाने हेतु वे सक्रिय हो गए हैं।

अब देखना यह है कि सुको के आदेश पर खाकीधारी किस कदर हावी होकर चिन्हित राजमार्गों को सूची से हटाते हैं ?

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