Published On : Thu, Apr 22nd, 2021

परिग्रह को जो सीमित रखता हैं वह संतोष का जीवन जीता हैं- आचार्यश्री विद्यानंदीजी

नागपुर : परिग्रह को जो सीमित रखता हैं वह संतोष का जीवन जीता हैं. भगवान महावीर ने कहा हैं वृक्षारोपण करो और वृक्ष के नीचे बैठो, वनस्पति द्वारा आपको ऑक्सिजन मिलेगा. हर नागरिक कर्तव्य हैं वृक्षारोपण करें यह उदबोधन आचार्यश्री विद्यानंदीजी गुरुदेव ने विश्व शांति अमृत महोत्सव के अंतर्गत श्री. धर्मराजश्री तपोभूमि दिगंबर जैन ट्रस्ट और धर्मतीर्थ विकास समिति द्वारा आयोजित ऑनलाइन समारोह में दिया.

आचार्य भगवंत ने कहा आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी ने जो कार्यक्रम चलाया हैं निश्चित ही सराहनीय हैं क्योंकि हमारा यह समय धर्म ध्यान में जायें, इस वेबिनार के माध्यम से अनेक साधु संतों को देख रहे हैं, सुन रहे हैं, आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं. इसके पहले ऐसा आयोजन नहीं हुआ यह आयोजन पिछले वर्ष से जारी हैं. भगवान महावीर जयंती हम नहीं मनाते, हम जन्म कल्याणक महोत्सव मनाते हैं. तीर्थंकर का जन्म तीन लोक का कल्याण करनेवाला होता हैं इसलिए जन्म जयंती के रूप नहीं, जन्म कल्याणक के रूप में मनाये. जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान और अंतिम तीर्थंकर महावीर हैं. भगवान महावीर का जन्म नाम वर्धमान था. भगवान महावीर वर्तमान शासन नायक हैं, शासन उनका चल रहा हैं. भगवान महावीर की आयु मात्र 72 वर्ष की थी. जिसमें 30 वर्ष युवराज काल में बीत गये. उसके बाद उन्हें वैराग्य हुआ, तप धारण किया. उसके बाद 12 वर्ष की तपस्या कर के केवलज्ञान प्राप्त किया. केवलज्ञान प्राप्त करने के बाद 30 वर्ष भगवान महावीर ने आर्यखंड का भ्रमण किया, चतुर्विध संघ की स्थापना की.

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भगवान महावीर का चतुर्थ काल था. मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका भगवान महावीर शासन काल में धर्म की आराधना कर रहे हैं. पंचबालयति में भगवान महावीर का नाम आता हैं. पांच तीर्थकरों के अलावा बाकी सभी तीर्थकरों ने राज्य शासन किया. लंबे अर्से तक संसारी सुखों का लाभ लिया और वृद्धत्व को धारण कर वैराग्यत्व को प्राप्त किया. पांच तीर्थंकरों ने राज्य शासन नहीं किया, सांसारिक चीजों का उपभोग नहीं किया. भगवान महावीर के पास केवलज्ञान था, जो प्रमुख वक्ता थे उनके पास सुननेवाले श्रोता थे उनके पास मति ज्ञान, श्रूति ज्ञान, अवधि ज्ञान, कुछ के पास मन पर्यायी ज्ञान था. भगवान महावीर ने अपने श्रोताओं को अनंत ज्ञान नहीं दिया. श्रुत ज्ञान, द्वादशांग ज्ञान दिया. जो भगवान महावीर के पांच अणुव्रतों को अपनाता हैं, गृहस्थी चलाता हैं उसके जीवन में कष्ट नहीं आता. अहिंसा उनका बल हैं, संबल हैं. जो शस्त्र को नहीं, शास्त्र को अपने रखता है वह जैन हैं.

जिसके उपर गुरु का साथ उसको देगी दुनियां साथ- आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी
आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी गुरुदेव ने धर्मसभा में कहा जानकारी पर्याप्त नहीं हो तो बातों पर नियंत्रण होना जरूरी हैं. आमदनी पर्याप्त नहीं हो खर्च पर नियंत्रण जरूरी हैं. सारी समस्या पंच पाप हैं. पंचव्रत का पालन किया तो सारी समस्या हल हो जायेंगी. राग, द्वेष, तनाव सब कुछ खत्म हो जायेगा. पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा हैं. महामारी को दूर करने के लिये हमें ही प्रयास करने होंगे. भगवान महावीर के अणुव्रतों को अपनाकर प्रकृति बचा सकते हैं, पर्यावरण को बचा सकते हैं. जिसके घर जिनवाणी हैं वह जैन हैं. शिक्षा सर्वोत्तम मित्र हैं. शिक्षा को मित्र बनाना चाहिये. शिक्षित व्यक्ति का सभी जगह आदर होता हैं, सम्मान भी मिलता हैं. जिसके उपर गुरु हाथ उसे देगी दुनियां साथ. धर्मसभा का संचालन स्वरकोकिला गणिनी आर्यिका आस्थाश्री माताजी ने किया.

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