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    Published On : Thu, Nov 16th, 2017
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    आमसभा का अस्तित्व खतरे में

    नागपुर: नागपुर महानगरपालिका की सदन याने मासिक आमसभा ही एक ऐसा अवसर है, ,जहां खासकर विपक्ष शहर व आम नागरिकों के ज्वलंत व पुरानी समस्याओं जिसे सत्ताधारी व घाघ प्रशासन जिंदा रखते हैं, उसे उठाते हैं. आज कल तो पक्ष हो या विपक्ष अपना उल्लू सीधा करने के लिए आमसभा में अपना आवाज बुलंद करते देखे गए हैं. ऐसे मामलों की आड़ लेकर सत्तापक्ष कोई भी नगरसेवक आगामी आमसभा में अपनी मर्जी से सवाल-जवाब न करे इसलिए उसे रोकने के लिए षडयंत्र रच रही है. जिस प्रश्नों से सत्ताधारियों के पसीने छूट सकते हैं, ऐसे प्रश्नों को आमसभा में रोकने के लिए मनमर्जी तरीक़े से कानून बना रही है. यह सब इसलिए भी मुमकिन है क्योंकि मनपा में विपक्ष ही नहीं है और जो है मूक-प्रदर्शन बने हुए हैं.

    सत्तापक्ष की इस षडयंत्र में मनपा में विपक्ष नेता तानाजी वनवे और बहुजन समाज पार्टी के पक्ष नेता मोहम्मद जमाल ने पद का दुरुपयोग करते हुए सत्तापक्ष के उक्त प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया है. उक्त प्रस्ताव पर वनवे व जमाल ने हस्ताक्षर कर अपने-अपने पक्षों के नगरसेवकों के अधिकारों का हनन किया है जिसकी हर तरफ निंदा हो रही है.

    मनपा में १५१ नगरसेवक सीधे जनता द्वारा चुनकर आये हैं, जिसमें से भाजपा याने सत्तापक्ष के १०८, कांग्रेस के २९, बसपा के १०, शिवसेना के २, एक एनसीपी और एकमात्र निर्दलीय नगरसेवक व नगरसेविकाएं हैं. इसके अलावा ५ मनोनीत नगरसेवक हैं, जिसमें से ४ भाजपा और एक कांग्रेस के हैं. सत्तापक्ष के दबाव में १०८ में से ८ ही खुलकर सवाल-जवाब करते दिख जाएंगे। शेष तो शिष्टाचार का पालन करते हुए सिर्फ उपस्थित होने की जिम्मेदारी निभाते नज़र आ जायेंगे. कांग्रेस की तो गुटबाजी चरम पर है, आपस में ही एक-दूसरे के सवाल-जवाब का गला रेतने में समय गवां रहे हैं. बसपा में पक्ष नेता जमाल अपने कमाल से अपने सभी नगरसेवकों को पक्ष में लेकर अपने अल्प कार्यकाल में सत्तापक्ष का साथ देकर सुख भोगने में लीन है.

    इन दिनों सत्तापक्ष के चुनिंदा और पक्ष-विपक्ष में उनके सहयोगी की लाखों-करोड़ों के साथ मनोरंजन-खेल सम्बन्धी प्रस्तावों को अहमियतें मिल रही हैं. सत्तापक्ष के इस ‘रिंग’ ने महापौर तक को नही छोड़ा है, अब जबकि महापौर धीरे-धीरे अपने ही पक्ष के घाघों के चाल को समझ गई, उन्होंने अपनी रणनीत में कई परिवर्तन किए, जो दिख रहे हैं.

    उल्लेखनीय यह है कि सत्तापक्ष के उक्त रणनीति से सत्तापक्ष के जागरुक नगरसेवक, बसपाई, कांग्रेसी व एनसीपी के नगरसेवक नाराज हैं. सभी का संयुक्त विचार यह समक्ष आया कि कुल मिलकर सत्तापक्ष अपने पदों का दुरूपयोग कर आमसभा का गला घोंटने का षडयंत्र कर रही है.

    आमसभा को लेकर गंभीर नहीं रहते नगरसेवक
    वैसे भी कभी आमसभा समय पर शुरू हुई ही नहीं है, आमसभा को लेकर अधिकांश नगरसेवक गंभीर नहीं है, प्रत्येक आमसभा में डेढ़ से लेकर २ घंटे के बाद ही सभा की कार्रवाई शुरू होती है. सभा की कार्रवाई शुरू होते ही पहले शोक सन्देश फिर अभिनंदन प्रस्ताव के बाद अमूमन ५ मिनट के लिए सभा की कार्रवाई स्थित कर दी जाती है. मनपासदन के ५ मिनट की स्थगिती एक घंटे के बराबर होती है. अर्थात २ से तीन घंटे प्रत्येक आमसभा के दिन बेकार में जाते ही हैं. इसके अलावा हंगामा, प्रायोजित हंगामा में समय जाता है. अक्सर प्रायोजित हंगामा के मध्य सत्तापक्ष अपने और अपनों के स्वार्थ पूर्ति कर आमसभा अनिश्चित काल के लिए स्थिगित कर वैसे ही आमसभा का वजूद समाप्त करती रही है. अब सत्तापक्ष द्वारा चुने गए चुनिंदे प्रश्नकर्ता को भी तय हद्द तक शब्द बाण छोड़ने की शर्तों पर आमसभा में सवाल-जवाब पूछने का अवसर दिए जाने के लिए नियम बनाना याने आमसभा के वजूद को मिटाने के बराबर है.

    सवाल पूछनेवाले बाद में नहीं मचाते बवाल
    अब तक जोश-जोश में आमसभा में अपने-अपने क्षेत्र या शहर की समस्या को नगरसेवकगण उठाते रहे हैं. इस दौरान कई दफे प्रशासन को उनके अधिकारियों के करतूतों के कारण नतमस्तक होते हुए भी देखा गया.तो दूसरी ओर जब प्रशासन सही रहा तो अधिकारी-अधिकारी को खुलेआम बचाते हुए भी नज़र आये. वहीं सत्तापक्ष हमेशा प्रशासन के साथ ही नज़र आया. आम सभा समाप्ति के बाद चुनिंदे नगरसेवक जिन्होंने आमसभा में अपनी आवाजें बुलंद की थी वैसे नगरसेवक दोबारा इस मुद्दे को उछालते नहीं दिखे. बाद में ऐसा बर्ताब करते जरूर दिखे, जैसे उन्हें उनके द्वारा उठाये गए सवालोँ से कोई वास्ता नहीं रह गया है.

    मिनट्स में होती है हेराफेरी
    आमसभा के प्रत्येक घटनाक्रमों को शब्दों में ढालने के लिए प्रत्येक आमसभा में समिति विभाग की ओर से स्टेनो तैनात रहते हैं. अक्सर देखा गया है कि आमसभा में निर्णय के नाम पर मंजूर-मंजूर ही होता है लेकिन बाहर में इतनी सफाई दी जाती हैं ,मानो वे जो कह रहे हैं वैसा सबकुछ हुआ हो. इतना ही नहीं आमसभा के निर्णय बाद में सत्तापक्ष की सलाह पर मनपा प्रशासन बदलता रहा हैं.


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