Published On : Fri, Feb 20th, 2015

चंद्रपुर : पानीत्याग आंदोलन के बाद कामगारों का श्रृंखलाबद्ध अनशन


27 फरवरी को कामगार आयुक्त की ओर बैठक

Rajura Employe
चंद्रपुर। यहां की राजुरा स्टील एंड अलॉय लि. कंपनी के कामगारों ने करीब 15 दिन पहले शुरू किये आंदोलन कामगार विभाग ने आयुक्त की ओर 27 फरवरी को कंपनी व्यवस्थापन के साथ बैठक रखने के बावजूद भी कामगारों ने अनशन शुरू रखने का निर्णय लिया. विशेषतः कामगारों ने ये लड़ाई एक साल पहले शुरू की थी. कामगार विभाग की लापरवाही से 55 कामगारों का रोजगार छीन गया है. जिससे कामगारों ने 15 दिन पहले मुंडन आंदोलन, अन्नत्याग आंदोलन और पानीत्याग आंदोलन की भूमिका ली. पानी त्याग आंदोलन करके अप्पर आयुक्त की बैठक करने के बाद ये आंदोलन क्या मोड़ लेगा इस पर सबका ध्यान लगा है.

मूल के अौद्योगिक कालोनी परिसर में करीब पांच साल पूर्व राजुरी स्टील एंड अलॉय लि. कम्पनी अस्तित्व में आई. करीब 85 कामगारों को रोजगार दिया गया. इसमें 55 कामगार स्थायी रूप से काम कर रहे थे. लेकिन कम्पनी बंद कर दी गई. इससे पहले कम्पनी शुरू होकर भी कामगारों पर अन्याय शुरू था. 12 घंटे काम करके भी आठ घंटे के पैसे मिलते थे. जिससे कामगारों ने अपनी आवाज बुलंद की. इस संदर्भ में पहली शिकायत 18 मार्च 2014 को कामगार आयुक्त की ओर की गई. इस दौरान कामगार विभाग ने अर्जी में दखल देकर रिपोर्ट तैयार की. कामगारों की शिकायत में सच्चाई होकर भी कंपनी पर कोई कार्रवाई  नही हुई. संतप्त कामगारों ने फिर 2 मई 2014 को अौद्योगिक विवाद अधिनियम अंतर्गत सहाय्यक कामगार आयुक्त की ओर प्रकरण दाखिल किया. वहां भी इसकी ओर किसी प्रकार का ध्यान नही दिया गया. जहां इसी महीने में कम्पनी बंद करने का निर्णय लिया गया और ये कम्पनी 12 मई 2014 को बंद हुई. इसी स्थिति में कामगारों का वेतन भी नही दिया गया.

उक्त प्रकरण कामगार आयुक्त विभाग के निदर्शन में लाकर भी कोई कार्रवाई नही की गई. इसलिए 23 मई 2014 को बैठक लेकर समझौता किया गया. इस बैठक में 16 जून 2014 से कामगारों को काम पर लेने के लिए कबुल किया गया. लेकिन इस पर भी कोई भी ठोस कदम नही उठाया गया. आखिर संतप्त हुए कामगारों ने 20 जून 2014 को जिलाधिकारी, सहाय्यक कामगार आयुक्त, कम्पनी व्यवस्थापन आदि को पत्र भेजकर समझौता करार कंपनी की ओर से पालन नही होने का बताया गया. जिससे संतप्त कामगारों ने 26 जून 2014 से कंपनी धरना आंदोलन की शुरुवात की. इस आंदोलन में राष्ट्रवादी जनरल कामगार संघ ध्यान दिया. लेकिन 23 जुलाई 2014 को मुंबई में कामगारों के प्रश्नों का हल निकालने के लिए बुलाया गया. लेकिन बैठक में कंपनी व्यवस्थापन और राजका संघ के प्रतिनिधी उपस्थित नही हुए. जिससे कामगारों को फिरसे एकबार खाली हाथ लौटना पड़ा.

इसकी शिकायत कामगारों ने अगस्त में तहसीलदार की ओर की गई. कंपनी व्यवस्थापन ने तहसीलदार के समक्ष पांच महीने का वेतन देने का कबुल किया. लेकिन उन्हें डेढ़ महीने का ही वेतन दिया गया. 23 अगस्त में हुए करार का पालन नही होने से कामगारों को काम पर लेने से मना किया गया. ऐसे में त्रस्त कामगारों ने विदर्भ प्रहार कामगार संघटना की ओर दौड़ लगाई और प्रकरण बताया. गत 15 दिनों से न्याय के लिए कामगार जिलाधिकारी कार्यालय के सामने लढ रहे है. लेकिन प्रशासन ने भी पीठ फेर ली है. लेकिन हक मिले बगैर अनशन पीछे नही लेंगे ऐसा कामगारों का कहना हैं. ऐसे में शासन इस पर क्या निर्णय लेती है इसपर सभी का ध्यान लगा पड़ा है.

कामगार विभाग की भूमिका संदेहास्पद – एड. चिपलुनकर   
राजुरी स्टील एंड अलॉय लि. ने जो अन्याय कामगारों पर किया और कामगार विभाग ने भी कामगारों की सत्यता जानकर भी कोई न्याय दिलाया. बकाया वेतन देने का वादा तोड़ के डेढ़ महीने का वेतन हाथ में थमा दिया. कम्पनी शुरू रहते हुए कोई कार्यवाई क्यों नही की गयी ऐसा प्रश्न एड. चिपलुनकर ने उपस्थित किया. कामगारों को मुंडन, अन्नत्याग और पानीत्याग आंदोलन अपनाना पड़ा. कामगार विभाग ने कम्पनी ने भंग किये करार की जानकारी वरिष्ठोंकों दी क्या ? ऐसा भी प्रश्न उपस्थित हो रहा है.