Published On : Sat, Sep 8th, 2018

आरएसएस के पाले में ‘पृथक विदर्भ’ की गेंद

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नागपुर : ’पृथक विदर्भ ’ की मांग बरसो पुरानी है. लेकिन इस मांग के साथ हर समय छल हुआ है. कभी नेताओं ने छल किया तो कभी राजनीतिक पार्टियों ने. इस मुद्दे का उपयोग वर्षो से राजनीतिक पार्टियां चुनाव के समय ही करते आए हैं. यह पृथक विदर्भ आंदोलन का इतिहास है. इतिहास के पन्नों में सिर्फ पृथक विदर्भ आंदोलन के नाम पर अपनी दुकान सजाने का काम ही नेताओं ने किया है. अपना फायदा और विदर्भ के मुद्दे को भुलने की किंमत ही सभी नेताओं ने अब तक वसूल की है| चुनाव खत्म, मुद्दा गायब जिस तरह मैच खत्म फुटबाल गायब|

चुनाव आया की फिर ‘पृथक विदर्भ’ की गेंद मैदान में फेंक दी जाती है| सभी राजनीतिक दल इसके साथ खेलना शुरू कर देते हैं. हर कोई यह बताने व जताने की जुगत में होता है कि हम ‘पृथक विदर्भ’ के समर्थक हैं. हर सत्ता में आए तो पृथक विदर्भ जरूर बनाएंगे. २०१४ से पहले तक तो भाजपा इसे बनाने के पक्ष में चुनाव के समय रहती थी, वहीं कांग्रेस भी ऐन-केन प्रकारेण इसका समर्थन करती रही है.

भाजपा ने २०१४ में अपने घोषणा पत्र में छोटे राज्यों को समर्थन, पृथक विदर्भ जरूर बनाएंगे यह नारा देकर विदर्भ में जीत हासिल की. लेकिन ४ साल बाद भी पृथक विदर्भ के मुद्दे पर किसी ने भी ठोस निर्णय नहीं लिया है. हर बार शिवसेना का विरोध व राज्य में युति का हवाला देकर इस मुद्दे को खेलती रही. इस मामले में शिवसेना की भूमिका स्पष्ट रही है वह पहले से ही पृथक विदर्भ के पक्ष में नहीं है. वह मुखरता से इसका विरोध करती है, लेकिन बाकी दल तो इसे फुटबाल समझ कर सिर्फ चुनाव में खेलते हैं.

लेकिन अब परिस्थिति बदली है. अबकि बार कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस व भाजपा को भी अपना मत स्पष्ट तौर पर जनता के समक्ष रखना होगा. आखिर वे पृथक विदर्भ बनाना चाहते हैं या नहीं. क्योंकि २०१९ में फिर से चुनाव होने हैं. पृथक विदर्भ को लेकर आंदोलन शुरू है, लेकिन उसका उग्र रूप देखने नहीं मिला है. लेकिन राजनीतिक बदलाव ने पृथक विदर्भ की संभावनाओं को बढ़ा दिया है. राजनीतिक पटल पर मोदी विरोध में सभी राजनीतिक दल एक मंच पर जमा होने की जुगत भिड़ा रहे हैं. ऐसे में राज्य की राजनीति में भी भूचाल सा आ गया है| राज्य की राजनीतिक परिस्थिति को देखे तो शिवसेना अलग राग अलाप रही है| वे भाजपा से अलग होकर खुद के बल पर लोकसभा व विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती है. ऐसी तैयारी भी की जा रही है.

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दूसरी तरफ कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस भी साथ मिलकर चुनाव लड़ने के मुद्दे पर सहमत हो चुकी है. सीटों का बटंवारा अभी बाकी है साथ ही कांग्रेस-रांका के साथ अन्य छोटे दल भी जुड़ना चाहते हैं. कांग्रेस का लक्ष भाजपा को हराना है. ऐसे में भाजपा में राज्य की राजनीति में मंथन शुरू हो गया है. यदि ऐसा हुआ तो महाराष्ट्र में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ सकता है| ऐसे कुछ सर्वे रिपोर्ट में खुलकर सामने आया है|

ऐसे में अब पृथक विदर्भ का मुद्दा भाजपा ने आरएसएस के पाले में डाल दिया गया है| राज्य की राजनीतिक परिस्थिति व आगामी चुनावों का आंतरिक सर्वे आरएसएस के माध्यम से किया जा रहा है| यदि महागंठबंधन होता है तो राजनीतिक परिस्थिति क्या रहेगी इसका आकंलन किया जा रहा है| महाराष्ट्र में विदर्भ पर अभी भी भाजपा की अच्छी पकड़ है| ऐसे में यदि आरएसएस का सर्वे सरकार के खिलाफ आता है तो आरएसएस भाजपा को पृथक विदर्भ अलग करने की सलाह दे सकती है| ताकि विदर्भ में भाजपा की सरकार बनी रहे| शेष महाराष्ट्र में जोड़ तोड़ कर सरकार बनाई जाए|

राजनीतिक विश्‍वस्त सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि आरएसएस द्वारा इस तरह का आंतरिक सर्वे शुरू है जो इन संभावनाओं को तलाश रहा है. यदि आरएसएस का सर्वे भाजपा के पक्ष में आता है तो पृथक विदर्भ नहीं बन पाएगा और यदि सर्वे भाजपा के पक्ष में नहीं आता है, तो निश्‍चित तौर पर पृथक विदर्भ अलग कर दिया जाएगा.

वर्तमान में राज्य की राजनीतिक दलीय स्थिति का आंकलन किया जाए तो विदर्भ की ६२ सीटों में से ४४ सीटें भाजपा के पास है. शिवसेना के पास मात्र ४ सीटें हैं. कांग्रेस के पास १० सीटें, उसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस के पास मात्र १ सीट है. अन्य के पास ३ सीटें है. इस परिस्थिति में विदर्भ में भाजपा की स्थिति मजबूत है. उसी तरह लोकसभा में भी विदर्भ की ११ सीटों में से १० सीटें भाजपा के पास ही है. ऐसी परिस्थिति में भाजपा पृथक विदर्भ का कार्ड खेलकर विदर्भ को अपनी झोली में ही रखना चाहेगा. लेकिन यह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर्वे पर निर्भर करता है.

महाराष्ट्र का विचार किया जाए तो आप देखेंगे की भाजपा के पास २८८ में से १२२ सीटें है. जिसमें से मात्र विदर्भ से ४४ सीटें है. शिवसेना के पास ६३, कांग्रेस ४२, राष्ट्रवादी कांग्रेस के पास ४१ सीटें है. जो सभी शेष महाराष्ट्र से आती है| ऐसे में गठबंधन का असर शेष महाराष्ट्र पर अधिक दिखाई देगा|. ऐसी परिस्थिति में पृथक विदर्भ करना ही भाजपा के पक्ष में दिखाई देता है.

ज्ञात हो कि आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक व प्रवक्ता रहे मा.गो. वैद्य ने भी पृथक विदर्भ का समर्थन किया था. भाजपा ने भी अपने भुवनेश्वर में हुए 1996 के सम्मेलन में छोटे राज्यों का प्रस्ताव पारित किया था. भाजपा ने ही 3 राज्यों का निर्माण भी एक साथ किया था. ऐसे में अब वह समय आ गया है जब पृथक विदर्भ की घोषणा की जा सकती है.

केंद्र की राजनीति में भी महागठबंधन की तैयारी से हलचल मची है. ऐसे में भाजपा भी अपने निर्णय फूंक-फूंक कर ले रही है. नोटबंदी, राफेल, कालाधन जैसे मुद्दों पर विपक्ष भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है. वहीं विदर्भ में जो पृथक विदर्भ का आंदोलन चलाया जा रहा है वे सभी भाजपा के समर्थित लोग ही चला रहे हैं. अधिवक्ता श्रीहरि अणे ने वर्तमान में पृथक विदर्भ आंदोलन की कमान सभांल रखी है. ज्ञात हो कि भाजपा ने ही श्रीहरि अणे को राज्य का महाअधिवक्ता बनाया था, बाद में भले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया. लेकिन माना यही जा रहा है कि यह भी भाजपा की ही रणनीति है कि पृथक विदर्भ के आंदोलन को जिंदा रखा जाए ताकि वक्त आने पर यह कहा जा सके कि हमने ही पृथक विदर्भ देने की घोषणा की थी.

जिसका राजनीतिक लाभ भी भाजपा लेना चाहती है. इस कारण अब राजनीतिक परिस्थितियों के बदलाव से पृथक विदर्भ की आस बढ़ी है. संभवत: लोकसभा चुनाव से पहले ही पृथक विदर्भ राज्य की घोषणा कर दी जाएगी, ताकि इसका लाभ लोकसभा चुनाव में भी हो सके. लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद ही राज्य विधानसभा के चुनाव भी होने हैं. ऐसे में भाजपा दोनों राज्यों पर अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए यह चाल चल सकती है. वहीं आरएसएस भी विदर्भ में अपने मुख्यालय होने से यहां अपनी ही समर्थित सरकार चाहती है, लेकिन यह सब आरएसएस के सर्वे पर निर्भर करता है.

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