Published On : Tue, Jun 6th, 2017

किसान आंदोलन सीएम के खिलाफ पश्चिम महाराष्ट्र के नेताओं का राजनीतिक षड्यंत्र – किशोर तिवारी

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Kishor Tiwari
नागपुर:
 राज्य में शुरू किसान आंदोलन को लेकर विपक्ष द्वारा निशाने पर लिए जा रहे मुख्यमंत्री का किसान नेता किशोर तिवारी ने बचाव किया है। तिवारी ने राज्य में शुरू किसान आंदोलन को जायज तो ठहराया है लेकिन इस आंदोलन के द्वारा विपक्ष के नेताओं द्वारा मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप भी लगाया है। तिवारी ने आंदोलन टाइमिंग पर सवाल खड़ा किया है उनकी माने तो हांलहि में एक सर्वे आया जिसमे मुख्यमंत्री देवेन्द फडणवीस की ग्रामीण भागों में लोकप्रियता चरम पर है इसके अलावा उनके नेतृत्व में बीजेपी लगातार ग्रामीण इलाको में जीत हासिल कर रही है। उनकी इसी लोकप्रियता से सकते में आये पश्चिम महाराष्ट्र के सभी दलों के नेता किसान आंदोलन को आधार बनाकर उन पर राजनीतिक हमला कर रहे है। शांति से शुरू आंदोलन के उग्र होने के पीछे की वजह तिवारी के अनुसार राजनीतिक सहभागिता है।

विदर्भ के जाने माने किसान नेता और फ़िलहाल कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त किशोर तिवारी राज्य सरकार की वसंतराव नाईक किसान स्वावलंबन मिशन के अध्यक्ष भी है। तिवारी का कहना है कि किसानो का आंदोलन केंद्र और राज्य सरकार में बनी सरकार द्वारा उनके बन में बनाए गए परसेप्शन का नतीजा है। पुरानी व्यवस्था से तंग आकर नई उम्मीद के साथ किसानो ने बीजेपी का चुनाव किया। चुनावी दौर में किसानो से बीजेपी ने और नरेंद्र मोदी ने कई तरह के वादे किये लेकिन बीते तीन साल में प्रभावी तरीको से वो वादे पुरे नहीं हो पाए जिस वजह से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के साथ अन्य राज्यों में किसान अपनी माँगो के लिए सड़को पर उतर रहे है। तिवारी ने मुख्यमंत्री को किसानों की समस्याओं को लेकर संवेदनशील करार दिया है। उनके अनुसार मुख्यमंत्री ने कई पहल की जिसका नतीजा रहा की किसानो के उत्पादन में वृद्धि हुई लेकिन उनके आर्थिक उत्त्पन में गिरावट आई। किसानो को न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम दाम में अपनी फ़सल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। रही कही कसर ख़राब व्यवस्था और भ्रस्ट प्रशासन ने पूरी कर दी। किसानो से वादा कर बीजेपी ने खुद अपने गले में घंटी बाँधी है।

बिना किसी तकनिकी खेल के हो संपूर्ण कर्जमुक्ति

तिवारी ने किसानो द्वारा उठाई गयी माँगो का पूरी तरह समर्थन करते हुए संपूर्ण कर्जमाफी की वकालत की है उन्होंने ने भी माना की किसानो का सारा कर्ज माफ़ होना चाहिए। कर्जमाफी में कोई शर्त या तकनीकी मसला शामिल नहीं होना चाहिए। पिछली बार 32 हजार करोड़ की कर्जमुक्ति का ऐलान हुआ था लेकिन इसमें से 22 हजार करोड़ सिर्फ पश्चिम महाराष्ट्र में चला गया। किसानो की समस्या विदर्भ और मराठवाड़ा में गंभीर है विदर्भ के किसानो के बात कर्ज लेने के लिए इंस्टीटूशन की प्रभावी व्यवस्था अब भी नहीं है इसलिए वह साहूकारों से कर्ज लेने के लिए मजबूर है। सरकार को कर्जमाफी का ऐलान करना चाहिए जिस दिन यह फैसला हो उसी दिन से इसे प्रभावी होना चाहिए। अगर वित्तीय वर्ष का तकनिकी विषय फैसले में शामिल किया जाता है तो मार्च में बाद का कर्ज फिर किसानो से सिर चढ़ जायेगा। छोटे किसान और जिन्होंने खेती के लिए बैंक का दरवाजा नहीं खटखटाया है उन्हें भी सरकार की योजनाओं में लाभ मिलना चाहिए।

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