Published On : Mon, May 4th, 2015

अकोला : शिक्षा के साथ बच्चों को संस्कारों के पाठ पढाएं अभिभावक

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अकोला
। इस अपने घर में यदि अपने बच्चों को उच्च शिक्षा देकर विदेश भेजने की बातें करते है तो यह पूरी तरह गलत है. अपने बच्चों को बचपन से ही अपनी मातृभाषा, संस्कृति, परिवार आदि के संदर्भ में ज्ञान देना अत्यंत जरूरी है. इसका मतलब यह बिलकुल ही नहीं होता कि हम अपने बच्चों को उच्च शिक्षा न दे. परंतु शिक्षा के साथ उसपर योग्य संस्कार करना भी उतनाही जरूरी होता है. यही हम बचपन से ही बच्चों के सामने उन्हें विदेश भेजने की बाते करेंगे तो वह अपनी संस्कृति का स्विकार करना कदापि मंजूर नहीं करेंगे. ऐसा उद्बोधन डा.राणी बंग ने किया, स्थानीय प्रमिलाताई ओक सभागृह में आईएमए की ओर से आयोजित उद्बोधनात्मक कार्यक्रम में वे बोल रही थीं.

उन्होंने कहा कि जब तक हम अपने बच्चों के सवालों का समाधानकारक जवाब नहीं देते तब तक उनके मन में छिपी समस्याओं का  निराकरण नही होता. इसलिए उनके सवालों को नजरंदाज न करते हुए उनका समाधान करना चाहिए. समाज में अधिकतर ऐसे उदाहरण होते है जिनके बच्चे उच्च शिक्षा लेकर विदेश तो गए परंतु अपने परिवार को पूरी तरह भूल गए या तो परिवारजनों की कोई समस्याओं में वह कोई मदद नही करते. नाबलिग उम्र में ही वे नशा के अधिन हो जाते है, शराब पीना, सिगारेट, तंबाकुजन्य पदाथों का सेवन करना शुरू कर देते  है. परंतु अभिभावक होने के नाते हम उनकी इन गलतियों को पीठ पीछे छुपाते है. ऐसी गतिविधियों को अंजाब देने की हिम्मत बच्चे तथा युवाजन करते हैं इसका एकमात्र प्रमुख कारण संस्कारों का अभाव होता  हैं. वर्तमान स्थिति पर नजर डाली जाए तो दिखाई देता है कि लडकेलड कियां घर में कोई भी काम करने में कतराते है.

माता-पिता की सेवा, उनका सम्मान, आदर जिस उम्र में करना चाहिए उस उम्र में बच्चे ही स्वयं की सेवा उनसे करवा लेते हैं. ऐसी स्थिति अपने घरों में न निर्माण हो इसलिए अभिभावकों ने सिमित रहकर  बच्चों पर लाड-प्यार बरसाना चाहिए. इस प्रकार विभिन्न उदाहरण देकर संस्कार एवं शिक्षा की परिभाषा को डा. राणी बंग ने बडी कुशलंता के साथ प्रस्तुत किया जिसका श्रवण कर उपस्थित सभी श्रोताओं के चेहरे पर समाधान दिखाई दे रहा था.

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