Published On : Tue, Jul 24th, 2018

रिटायर्ड कर्मियों का अड्डा बना एनईएसएल

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NMC

नागपुर : वर्ष २०१४ में लोकसभा और ६ माह बाद विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी भाजपा का घोषणा पत्र आज तक जस का तस है. जिसमें सबसे महत्वपूर्ण वादों में से एक था कुशल-अकुशल युवा बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का वादा. यह भाजपा मेनिफेस्टो की ख़िलाफ़त खुद भाजपा के नेता कर रहे हैं. मनपा के नेताओं में यहां एकसूत्री कार्यक्रम के तहत शहर व जिले के युवाओं को दरकिनार कर सेवानिवृत्तों को दोहरा लाभ पहुँचाने का कारनामा निरंतर जारी है.

एनईसीएल को बनाया माध्यम
दरअसल एनईसीएल(नागपुर एन्वॉयरमेंट सर्विस लिमिटेड) का गठन मनपा अधीनस्त के लिए बनी २४ बाय ७ जलापूर्ति योजना के सफल संचालन के लिए किया गया था. एनईसीएल करार, उम्मीद के अनुरूप काम करने में आज तक इसलिए असफल रही क्यूंकि एनईसीएल के अधिकांश खाकी और खादी संचालक अपने-अपने क्षेत्रों में असफलता के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान सत्तापक्ष इस असफलता को सफलता में परिवर्तित करने की कोशिश के बजाय उन्होंने अपने-अपने करीबी हर प्रकार से ‘रिटायर्ड’ हो चुके चापलूसों को सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्त कर मनपा में कायम रख उपहार देने का क्रम जारी रखे हुए है.

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वर्तमान में शशिकांत हस्तक और रिज़वान सिद्दीकी ऐसे अधिकारी हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में विवादों के इर्द-गिर्द हमेशा खुद को रखा. हस्तक कर और जलप्रदाय विभाग प्रमुख रहे, कर में की गई धांधली सार्वजानिक होते ही जलप्रदाय विभाग प्रमुख बनाए गए. हस्तक जब कर विभाग प्रमुख थे तो सैकड़ों घरों का वार्षिक संपत्ति कर २ आंकड़ों में था. खास तौर पर मनपा अधिकारियों का, जलप्रदाय विभाग ने इतनी सफलता से संचालन किया कि विभाग का निजीकरण हो गया. विभाग के निजीकरण के बाद उनके सफल संचालन के लिए एनईसीएल का गठन किया गया. जिसमें विषय के विशेषज्ञ निरूपित कर निदेशक बनाया गया. क्यूंकि वे सत्तापक्ष के आकाओं के निकट के है.

रिज़वान सिद्दीकी को शहर में फ़ाइलों में अड़ंगे लगाने के लिए जाना जाता है. ये अपने कार्यकाल में शहर के गिने-चुने विशेष लोगों को ही ‘एंटरटेन’ किया. इनकी कार्यशैली में इनके पास वक़्त कम होता था, बावजूद इसके मनपा में ‘दो नंबर’ के अधिकारी पद तक पहुंचकर सेवानिवृत्त हुए. आखिरी वर्षों में सिद्दीकी को सत्तापक्ष ने फाइल अड़ाने का ही काम दिया, जिसे बखूबी अंजाम दिए. सेवानिवृत्त होने के पूर्व सत्तापक्ष ने एनईसीएल का निदेशक बनाकर मनपा में कायम रखने का तोहफा दिया.

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उक्त दोनों अधिकारी अच्छी खासी पेंशन के साथ तोहफे में मिले निदेशक पद का लाभ उठा रहे हैं.

अगर सत्तापक्ष की दूरदर्शिता रहती तो वीएनआईटी जैसे संस्थान से निकलने वाले ‘मेरिटोरियस’ युवा ब्रेन को हस्तक और सिद्दीकी की जिम्मेदारी दी जाती तो एनईसीएल और २४ बाय ७ प्रकल्प का उच्चांक कुछ और ही होता.

सत्तापक्ष यही नहीं थमा. जल्द ही सेवानिवृत होने जा रहे मोहम्मद इज़राइल को भी एनईसीएल के मार्फ़त मनपा में कायम रखने की योजना बनाए हुए है. एनईसीएल या स्मार्ट सिटी की राह से मनपा में बने रहने के लिए कुछ माह में सेवानिवृत होने जा रहे डी डी जांभुळ्कर भी पक्ष-विपक्ष के नेताओं से सिफारिश करवा रहे हैं.

एनईसीएल के निदेशक संजय गायकवाड़ जो जलप्रदाय विभाग के कार्यकारी अभियंता हैं,वे इसी माह सेवानिवृत होने जा रहे हैं. इनकी जगह इन्हें ही या फिर अन्य किसी का नंबर लगता है. इस ओर भी इच्छुकों की जिज्ञासा बनी हुई है.

स्मार्ट सिटी व परिवहन विभाग में सेवानिवृत्तों का राज
गत माह कांग्रेस के वरिष्ठ नगरसेवक किशोर जिचकर ने स्मार्ट सिटी के मुखिया और कागजों पर स्मार्ट सिटी प्रकल्प पर सवाल खड़ा कर मनपा को कटघरे में ला खड़ा किया था. सत्तापक्ष भी स्मार्ट सिटी मुखिया की कार्यशैली से नाराज था. स्मार्ट सिटी के मुखिया रामनाथ सोनावणे भी मनपा के अतिरिक्त मनपा आयुक्त पद से सेवानिवृत्त होने के दूसरी दिन पूर्व मनपायुक्त की वजह से स्मार्ट सिटी प्रकल्प के मुखिया पद की जिम्मेदारी संभाल ली. इस पद के लिए रामनाथ सोनावणे की नियुक्ति गुपचुप तरीक़े से पूर्व मनपायुक्त ने कर, पुणे रवाना हो गए. स्मार्ट सिटी प्रकल्प में भी मनपा के कुछ अधिकारी सीधे नियुक्त कर दोहरा लाभ उठा रहे हैं. जब मनपा में थे तो लंदन स्ट्रीट प्रकल्प का काम देख रहे थे. वह प्रकल्प आज भी कागजों पर झंडे गाड़ रहा है.

परिवहन विभाग में भी सेवानिवृत अधिकारियों की लम्बी फेरहिस्त है. इनमें से अधिकांश सत्तापक्ष के सिफारिश पर ‘एडजस्ट’ किए गए. समझा जाता है कि यह विभाग मेट्रो रेल को हस्तांतरित करने का निर्णय लिया जा चुका है. उक्त सभी पेंशन के साथ बोनस में मलाईदार पद का लाभ उठा रहे हैं. अर्थात सत्तापक्ष की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है.

अनुभवी तकनिकी अधिकारी किए गए दरकिनार
मनपा में गायकवाड़,तालेवार जैसे कनिष्ठ अधिकारी को मनपा प्रशासन के कांधों पर बन्दूक रख सत्तापक्ष ने ‘टॉप का अधिकारी’ बना तो दिया लेकिन गुणवत्ता नहीं होने के कारण मनपा प्रशासन और शहर को कोई लाभ नहीं हुआ. क्यूंकि उन्हें बाबूगिरी का अनुभव तगड़ा और तकनिकी ज्ञान लेष मात्र भी नहीं था. १९९५ से २००० के मध्य भी शहर में सीमेंट सड़कें बनी थीं, वे आज भी अच्छी सेवाएं दे रही थीं. इन्हें जिनके नेतृत्व में निर्माण किया गया था उन अधिकारियों को दरकिनार कर नए नवेलों के हाथ में वर्तमान में निर्मित हुई और हो रही सीमेंट सड़के बनते ही जवाब दे रही हैं. दूरदर्शिता की कमी कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

इसी वजह से मनपा प्रशासन को बात-बात पर ‘पीएमसी’ नियुक्ति कर सालाना करोड़ों बहाना पड़ रहा है. उससे भी मसला सुलझ नहीं रहा.
सवाल यह है कि क्या उक्त ज्वलंत उद्धहरणों को सज्ञान में लेकर चिंतन-मनन कर प्रशासन कुछ उल्लेखनीय सुधार करेगा या फिर ढल जाएगा.

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