– जल संकट गहराया तो प्रशासन की टेढ़ी नजर पूलों पर, संचालकों ने दिया तर्क – हम पानी के दुश्मन नहीं, बचत के दोस्त हैं
नागपुर :शहर की प्यास बढ़ती जा रही है। भूजल पाताल में जा रहा है, बोरवेल पर ताले लग चुके हैं, और अब प्रशासन की अगली नजर है शहर के चमचमाते स्विमिंग पूलों पर। सवाल उठ रहा है – क्या मौज-मस्ती के इन अड्डों पर ताला लगेगा?
इस सवाल ने पूल संचालकों में खलबली मचा दी है। हालांकि संचालकों का कहना है कि जिलाधिकारी, महानगरपालिका या एनआईटी का जो भी आदेश होगा, सिर आंखों पर। लेकिन पूल को विलेन बनाना गलत है।
दो तरह के पूल, दो तरह की कहानी
शहर में पूलों की दो दुनिया है। एक, जिनके पास अपना कुआं-बोरवेल है और जो अंबाझरी जैसे गैर-पीने योग्य स्रोत से पानी लेते हैं। दूसरे, जो सीधे मनपा के नल से अपनी टंकी भरते हैं। अब प्रशासन इसी लकीर पर कार्रवाई की तैयारी में है।
‘हम अंबाझरी का पानी पीने नहीं देते’
एनआईटी पूल चलाने वाली मिडलैंड स्पोर्ट्स एंड वेलनेस के एमडी प्रशांत उगेमुगे ने कहा, “हमारे पूल और शॉवर का पानी सीधा अंबाझरी से आता है। इसका आपके घर के पीने वाले पानी से कोई लेना-देना ही नहीं है। अंबाझरी का पानी नागपुर में कोई पीता ही नहीं।”
उन्होंने समझाया, “लोगों को लगता है हम रोज पूल खाली कर नया पानी भरते हैं। सच्चाई यह है कि एक बार पूल भर गया तो वही पानी महीनों तक फिल्टर होकर चलता है। बर्बाद सिर्फ वही पानी होता है जो तैरते वक्त छलक जाता है या शॉवर में बहता है।”
फिलहाल बंदी का कोई आदेश नहीं आया है, पर आदेश आया तो पालन होगा।
असली विलेन कौन ?
उगेमुगे ने बड़ा सवाल उठाया, “असली संकट पूल नहीं, हमारी आदतें हैं। हम शॉवर के नीचे 20 मिनट खड़े रहते हैं, शेविंग करते वक्त नल खुला छोड़ देते हैं। बाल्टी से नहाओ, नल बंद रखो, तो एक घर ही रोज 100 लीटर पानी बचा लेगा। आईटी पार्क में गाड़ी धोने और बगीचे के लिए एसटीपी का पानी इस्तेमाल होता है, यही हर बड़ी बिल्डिंग में क्यों नहीं?”
पूल बर्बादी नहीं, बचत का मॉडल है
पूर्व उपनिदेशक क्रीड़ा और अंतरराष्ट्रीय तैराकी प्रशिक्षक डॉ. जयप्रकाश दुबले ने तो पूल को हीरो बता दिया। मानेवाड़ा-बेसा रोड स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्विमिंग के निदेशक दुबले कहते हैं, “पहले पूलों को हर 15 दिन में खाली करना पड़ता था। अब टेक्नोलॉजी बदल गई है। आधुनिक पूल क्लोज्ड-लूप सिस्टम हैं। पानी फिल्टर होता है, रीसाइकिल होता है, फिर से इस्तेमाल होता है।”
उनका धांसू तर्क सुनिए, “सोचिए, 200 लोग अगर घर पर नहाएं तो 200 बार पानी नाली में जाएगा। वही 200 लोग अगर पूल में आएं, तो वही पानी फिल्टर होकर फिर काम आएगा। अगर पूल में भी बाल्टी और समझदारी से शॉवर का उपयोग हो, तो पूल घर से ज्यादा पानी बचाता है।”
यानी बात साफ है, नागपुर को पूल बंद करने से ज्यादा, नल बंद करने की आदत डालने की जरूरत है।



