
बोरा ने कहा, “सत्ता के खिलाफ बोलने वालों को पाकिस्तानी कहा जाता है। आदिवासी विद्यार्थी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं, तो उन्हें ‘अर्बन नक्सलवादी’ करार दिया जाता है। लेकिन अब देश के विद्यार्थी सवाल पूछ रहे हैं। उनकी आवाज दबाई नहीं जा सकती।”
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने विकास के बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन इस विकास का लाभ आम जनता के बजाय सत्ताधारियों को ही मिला। बोरा ने कहा कि बेरोजगारी का सवाल गंभीर होने के बावजूद युवाओं के भविष्य को लेकर सरकार के पास कोई ठोस जवाब नहीं है।
विद्यार्थी आंदोलन, किसान आंदोलन और विभिन्न लोकतांत्रिक संघर्षों का संदर्भ देते हुए बोरा ने कहा, “हम अपने साथियों पर बरसी लाठियां, उनकी आंखों के आंसू और संघर्ष में गई जानों को नहीं भूले हैं। सरकार ने पिछले एक दशक में जनता के बीच डर पैदा किया है; अब इस डर को छोड़कर फिर से संघर्ष खड़ा करने का समय आ गया है।”
केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए उन्होंने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा, “नागपुर को आरएसएस का गढ़ माना जाता है; लेकिन नागपुर आरएसएस का नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान का गढ़ है, यह यहां की जनता को साबित करना चाहिए।”
बोरा ने नागपुर के लोगों से आंदोलन का आह्वान करते हुए कहा, “महाराष्ट्र में सत्ताधारियों के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत नागपुर से होनी चाहिए। विद्यार्थी आंदोलन को और मजबूत करें। हम आपके साथ हैं, आप भी हमारे संघर्ष में शामिल हों।”
इस बीच, बोरा ने चेतावनी दी कि सरकार विद्यार्थियों के सवालों पर तत्काल रुख स्पष्ट करे, अन्यथा आंदोलन को और तीव्र किया जाएगा।



