
नागपुर: कांग्रेस में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है, लेकिन नागपुर में पार्टी के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरण एक बार फिर चर्चा में हैं। शहर कांग्रेस की कमान प्रफुल्ल गुडधे के हाथों में आने के बाद संगठन को मजबूत करने और नाराज कार्यकर्ताओं को दोबारा साथ लाने की कोशिशें तेज हुई हैं। नगरसेवक चुनावों में टिकट कटने से नाराज रहे कुछ कांग्रेसियों की घरवापसी के बीच अब पार्टी के भीतर एक अलग सवाल उठ रहा है-जब कांग्रेस पुराने नाराज नेताओं को फिर से जोड़ने में जुटी है, तो पार्टी से जुड़े कुछ प्रमुख नेता और उनके समर्थक आंदोलनों से दूरी क्यों बनाए हुए हैं?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर निकाले गए SIR विरोधी मोर्चे में पूर्व मंत्री सुनील केदार और अनिल देशमुख जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। हालांकि, पार्टी के कुछ प्रमुख चेहरों और उनके समर्थकों की गैरमौजूदगी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई।
इसी बीच कांग्रेस से निष्कासित नरेंद्र जिचकार की आंदोलन में मौजूदगी ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी। कभी कांग्रेस के भीतर सक्रिय रहे जिचकार अब बहुजन विचार मंच के बैनर तले आंदोलन में पहुंचे। ऐसे में कांग्रेस के भीतर पुराने और नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रफुल्ल गुडधे के नेतृत्व में कांग्रेस जहां नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को दोबारा जोड़ने की कोशिश कर रही है, वहीं पार्टी के कुछ पुराने और प्रभावशाली चेहरे आंदोलनों से दूरी बनाते क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या यह केवल व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरण हैं या नागपुर कांग्रेस में गुटों के बीच खींचतान अब भी बरकरार है?
SIR के खिलाफ निकाला गया मोर्चा विपक्षी एकजुटता दिखाने का मंच था, लेकिन नागपुर में इस आंदोलन ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
एक और चर्चा कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को लेकर है। नागपुर शहर में होने वाले कांग्रेस के आंदोलनों में स्थानीय कार्यकर्ताओं की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े कार्यकर्ताओं की मौजूदगी अधिक दिखाई देने की चर्चा पार्टी के भीतर और राजनीतिक गलियारों में है।
सवाल यह है कि जब आंदोलन शहर में हो और मुद्दा पूरे महाराष्ट्र तथा देश की राजनीति से जुड़ा हो, तो शहर कांग्रेस के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता कितनी मजबूती से मैदान में दिखाई दे रहे हैं?
एक तरफ पुराने नाराज नेताओं को वापस जोड़ने की कोशिश और दूसरी तरफ पार्टी के कुछ प्रमुख चेहरों तथा उनके समर्थकों की दूरी-इन दोनों तस्वीरों ने नागपुर कांग्रेस के संगठन, नेतृत्व और आपसी तालमेल को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या नागपुर कांग्रेस में सुलह की कोशिशों के बीच अंदरूनी दूरी अभी भी बरकरार है? यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।




