Published On : Tue, Aug 22nd, 2017

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पितृसत्तात्मकता से मुस्लिम सामाजिक की महिलाओं को मिलेगी मुक्ति – रुबीना पटेल

Supreme Court
नागपुर:
लंबे वक्त से देश में बहस का मुद्दा रहे ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फ़ैसला मंगलवार को सुनाया। पांच जजों की पीठ ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया। अदालत के आदेश के बाद साफ़ है अब संसद में कानून बनाया जायेगा। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद मुस्लिम समुदाय की उन महिलाओं में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी है जो ट्रिपल तलाक की पीड़ित थी।

नागपुर की रुबीना पटेल लंबे वक्त के मुस्लिम समाज की महिलाओ के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रही थी। सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक को बंद करने की माँग के साथ रुबीना के संगठन मुस्लिम महिला मंच ने भी याचिका दी थी। अब जब ट्रिपल तलाक पर देश की सर्वोच्च अदालत का फैसला का चुका है तो रुबीना ने इस पर ख़ुशी जाहिर की है। रुबीना के मुताबिक देर से ही सही इतने वर्षो बाद मुस्लिम समाज की महिलाओं के मुलभुत अधिकार की सुध ली गयी।

वर्ष 2004 में खुद ट्रिपल तलाक का दंश झेल चुकी रुबीना ने अपने हक़ के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। रुबीना के मुताबिक उसके सरकारी कर्मचारी पति ने शरीयत कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ से मिले अधिकारों का फ़ायदा उठाते हुए उसके साथ अन्याय करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह अदालत गयी वहाँ जीत मिली बावजूद इसके उसे हक़ नहीं दिया गया। इतने वर्षो बाद रुबीना ट्रिपल तलाक के दंश से उबर कर न सिर्फ अपने लिए बल्कि अपने की समाज की अन्य महिलाओ के लिए लड़ाई लड़ रही है। रुबीना का कहना है वर्षो तक उन्हें खुद के बच्चो से दूर रखा गया उसे मुआवजे और मासिक भत्ते के अधिकारों से तक वंचित कर दिया गया। मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति का जिक्र करते हुए वह बताती है की मुस्लिम समाज के हर चौथे घर में आप को महीला के साथ इसी तरह का अन्याय मिलेगा। पर अब देश के सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के बाद ऐसी महिलाओं के लिए सुरक्षा और संरक्षण निर्माण हो पायेगा।

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संवैधानिक नहीं है मुस्लिम पर्सनल लॉ
रुबीना के अनुसार मुस्लिम समाज में पितृसत्तात्मक भाव कूट-कूट कर भरा है। इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान की गयी है बावजूद इसके पुरुष महिलाओं पर अपनी सत्ता स्थापित रखने के लिए कानून को अपने हिसाब से गठ कर रहा है। इस कानून में महिला के अधिकार उसकी स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं है। शरीयत कानून लिखित रूप से है नहीं मौलवी या अन्य धर्मगुरु जुबानी फैसला देते है ज्यादतर फैसले महिला विरोधी ही होते है। दुनिया के 22 इस्लामिक देशों में मुस्लिम पर्सनल लॉ कानून को बदला जा चुका है बावजूद इसके हिन्दुस्तान में बदलाव का विरोध किया जाता है।

कानून में तय हो महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा
रुबीना पटेल ने माँग की है की संसद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जो कानून बने उसमे मुस्लिम महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा को तय किया जाये। उनकी शिक्षा,रोजगार,विकास की रुपरेखा को समाविष्ट किया जाये। अब तक जो महिलाएं ट्रिपल तलाक की शिकार हो चुकी है उन्हें भी उनका अधिकार मिले। असंवैधानिक रूप से चल रही शरीयत अदालत को महिलाओं के मसले के दूर रखा जाये।

मुद्दा संवेदनशील न हो राजनितिक इस्तेमाल
रुबीना पटेल ने कानून बनने को लेकर शंका भी जाहिर ही है। उनके मुताबिक ट्रिपल तलाक जितना सामाजिक मुद्दा बनकर नहीं उभरा उससे कही ज्यादा इसे राजनीतिक बनाया गया है। हमें डर है की कही राजनीतिक रूप ने ही इसे कमज़ोर न बना दिया जाये। 1985 में शाहबानो के मसले पर भी सुप्रीम कोर्ट ने कानून बनाने को कहाँ था जो अब तक नहीं बन पाया है। अगर राजनीति हावी हो गयी तो हमारी लड़ाई कमजोर हो जाएगी। शंका के बीच उन्होंने संसद से महिलाओं के लिए फायदेमंद कानून बनाने की अपील की है।

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