Published On : Mon, Feb 7th, 2022
By Nagpur Today Nagpur News

मनपा चुनाव : बागियों पर शिवसेना, राकांपा की नजर

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नागपुर: मनपा चुनाव अपने दम पर सिर्फ भाजपा और कांग्रेस लड़ने वाली हैं,इन दोनों पक्षों के पास उम्मीदवारों की फेरहिस्त लगभग दोगुनी हैं, ऐसे में उम्मीदवारों का टोटा झेलने वाली एनसीपी और शिवसेना का पूरा ध्यान कांग्रेस और भाजपा के बागियों पर रहेगा. इसके लिए दोनों पार्टियां उन लोगों पर नजर रख रही हैं जो पहले से ही बगावत की राह में हैं. दूसरी ओर भाजपा बैठकों पर जोर दे रही है और कांग्रेस डिजिटल पंजीकरण पर जोर दे रही है।

यह भी कटु सत्य हैं कि शिवसेना और राकांपा के पास की 156 सीटों के लिए लड़ने के सक्षम कार्यकर्ता नहीं हैं.दोनों पक्षों के शीर्ष नेताओं ने शहर/जिले में पक्ष बढ़ाने पर पिछले 3 दशक में जोर नहीं दिया।नतीजा दोनों पक्षों के मेहनतकश कार्यकर्ता के भरोसे शहर में पक्ष को जिन्दा रखे हुए हैं.

पिछले 6 माह में दोनों पक्षों ने स्वयं के कार्यकर्ताओं में ऊर्जा पैदा करने के बजाय बाहरी आक्रामक/सक्षम कार्यकर्ताओं को पक्ष में जगह देकर एक ओर पक्ष को मजबूत करने का राग आलाप रहे तो दूसरी ओर कई दशक से पार्टी में दरी उठाने वाले कार्यकर्ताओं को दरकिनार किये जाने से सभी के सभी क्षुब्ध हैं.

सेना और एनसीपी यह चुनाव अकेले या दोनों मिलकर साथ में लड़ने का प्लान कर रही,क्यूंकि कांग्रेस पहले ही अलग/स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं.

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सेना और एनसीपी को पूरे शहर में प्रत्याशी नहीं मिला. सेना के पास 1 या 2 प्रभाग में लड़ने लायक शिवसैनिक रूपी उम्मीदवार हैं.इसकी संख्या बढ़ाने के लिए कई पूर्व कोंग्रेसियों को शिवसेना में जबरन लाया गया,जिन्हें तय रणनीति के आधार पर उम्मीदवारी या फिर इनके चुनावी क्षेत्र में कांग्रेस का समर्थन लेकर लगभग 1 दर्जन नगरसेवक चुन कर लाने की कोशिश का क्रम शुरू हैं.

वहीं एनसीपी के पास शिवसेना जैसी स्थिति हैं लेकिन इन्हें किसी का समर्थन हासिल नहीं हैं.नतीजा दोनों पक्ष अगर स्वतंत्र या गठबंधन में लड़े तो भाजपा और कांग्रेस के बागी ही रामबाण साबित हो सकते हैं.

भाजपा में बैठक ही बैठक

मनपा चुनाव में उम्मीदवारी की सबसे ज्यादा मांग भाजपा की है। हालांकि, भाजपा कार्यकर्ता शहर, मंडल, वार्ड और उसके बाद होने वाली बूथ बैठकों से खासे कश्मकश में हैं. चुनाव से पहले भाजपा ने संभावित उम्मीदवारों का आंकलन कर ली है,समय पर कुछेक बदलाव होंगे,वह भी जातिगत/आरक्षण की वजह से. दूसरी ओर बैठकों से कार्यकर्ताओं को आभास नहीं हो रहा कि नेतृत्व का मूड क्या हैं.

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