
भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मुकदमें, न्यायाधीशों की कमी, आधारभूत सुविधाओं का अभाव और प्रक्रियात्मक जटिलताएं आज सबसे बड़ी चुनौती हैं। मुकदमा केवल फाइल नहीं, उसके पीछे किसी का घर, आजीविका, प्रतिष्ठा और पूरे परिवार का भविष्य जुड़ा होता है।
1. लंबित मुकदमों का पहाड़ :
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के 2026 के आंकड़ों के अनुसार जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग *5.16 करोड़* मामले लंबित हैं, जिसमें 4.04 करोड़ आपराधिक और 1.12 करोड़ दीवानी मामले हैं। ये गतिशील आंकड़े हैं। इसका अर्थ है करोड़ों नागरिक अंतिम फैसले की प्रतीक्षा में हैं। चिंता तब बढ़ती है जब न्याय मिलने से पहले ही वादी की मृत्यु हो जाती है और अगली पीढ़ी वही लड़ाई लड़ती है।
2. हर स्तर पर चुनौती :
आम आदमी का सबसे ज्यादा संपर्क जिला न्यायालयों से होता है। गवाही, दस्तावेज जांच, जमानत में समय लगता है, फिर अपील हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाती है। अपील का अधिकार जरूरी है, लेकिन हर स्तर पर देरी प्रक्रिया को ही सजा बना देती है। इसलिए जरूरी है कि यह बताया जाए कि कितने मामले 5, 10, 15, 20 साल से लंबित हैं, सिर्फ कुल संख्या नहीं।
3. न्यायाधीशों की कमी :
कानून मंत्रालय के 1 जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार उच्चतम न्यायालय में स्वीकृत 38 पदों में से 32 कार्यरत हैं, 6 खाली हैं। 25 उच्च न्यायालयों में 1,122 स्वीकृत पदों में से 789 कार्यरत हैं, “333 पद खाली” हैं, यानी लगभग 30% रिक्ति। जिला न्यायालयों में भी नियमित मूल्यांकन जरूरी है। नियुक्ति में देरी समस्या को गंभीर बनाती है।
4. तीनों स्तरों के आंकड़े एक साथ :
– जिला न्यायालय : 5.16 करोड़
– उच्च न्यायालय : 65.43 लाख
– उच्चतम न्यायालय : 95,739
यह समस्या किसी एक स्तर की नहीं, पूरे तंत्र की है।
5. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी :
फरवरी 2026 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिला न्यायपालिका में 25,894 न्यायिक अधिकारियों के पद स्वीकृत हैं, जबकि 21,027 कार्यरत हैं। न्यायालय कक्ष 22,712 हैं। कई जगह रिकॉर्ड प्रबंधन, प्रतीक्षालय, डिजिटल सुविधाओं का असमान उपयोग है। ग्रामीण नागरिकों के लिए अदालत तक पहुंचना ही खर्चीला है। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च निवेश है।
6. आपराधिक मामलों का बोझ ज्यादा :
जिला अदालतों में 4.04 करोड़ आपराधिक बनाम 1.12 करोड़ दीवानी मामले हैं, यानी 3.6 गुना ज्यादा। सवाल है क्या छोटे विवादों को समय पर सुलझाया जा रहा है? पुलिस जांच, आरोपपत्र, गवाहों की पेशी में देरी कम हो सकती है। जहां कानून इजाजत दे, लोक अदालत, मध्यस्थता से समाधान हो सकता है, लेकिन हर आपराधिक मामला समझौता योग्य नहीं।
7. छोटे मामलों में एकमुश्त राहत – क्या समाधान ?
बोझ कम करने के लिए एक सुविचारित योजना बन सकती है:
– सीमित नुकसान, गंभीर हिंसा न वाले छोटे अपराधों की सूची बने।
– वर्षों से लंबित छोटे मामलों को चिन्हित किया जाए।
– वैधानिक समझौते, लोक अदालत को प्रोत्साहन।
– संसद द्वारा पात्र मामलों में स्पष्ट पात्रता, अपवाद और न्यायिक निगरानी के साथ सीमित राहत।
– हत्या, बलात्कार, महिलाओं-बच्चों के विरुद्ध गंभीर अपराधों को ऐसी योजना से बाहर रखा जाए। पहली बार मामूली अपराध करने वालों के लिए चेतावनी, परिवीक्षा जैसे सुधारात्मक विकल्प देखे जाएं। मकसद अपराध को बढ़ावा देना नहीं, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग है।
8. पारदर्शिता और जवाबदेही :
न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता विरोधी नहीं। नागरिक को जानने का हक है कि देरी क्यों हो रही है। NJDG जैसे मंच अहम हैं। उपाय: हर मुकदमे की स्थिति ऑनलाइन, बार-बार स्थगित होने वाले मामलों की समीक्षा, स्थगन कारणों का रिकॉर्ड, पुराने मामलों की सार्वजनिक रिपोर्ट, रिक्त पदों-लंबित मामलों के आंकड़े नियमित अपडेट, समन तामील में देरी का समाधान। लेकिन पारदर्शिता के नाम पर सिर्फ संख्या से जजों के फैसलों की गुणवत्ता आंकना उचित नहीं।
9. ठोस सुधार के 12 सुझाव :
I. रिक्त पद समय पर भरें, कार्यभार के आधार पर पदों की समीक्षा हो।
II. 5, 10, 15, 20 साल से पुराने मामलों के लिए विशेष अभियान, पर नए जरूरी मामलों की अनदेखी न हो।
III. बिना कारण तारीख पर रोक, गवाह अनुपस्थिति, समन तामील की समस्या हल हो।
IV. छोटे मामलों के लिए सरल, समयबद्ध प्रक्रिया।
V. ई-फाइलिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का विस्तार, साथ में सहायता केंद्र।
VI. भवन, कक्ष, कर्मचारी, तकनीक के लिए पर्याप्त बजट।
VII. पुलिस जांच, फोरेंसिक, अभियोजन और न्यायालय में बेहतर समन्वय।
VIII. पारिवारिक, व्यापारिक, संपत्ति विवादों में वैकल्पिक समाधान को बढ़ावा।
IX. गरीबों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता की गुणवत्ता सुधार।
X. कार्यभार, निपटारे, स्थगन की नियमित समीक्षा, मकसद दबाव नहीं, कमी पहचानना।
XI. जमीन, उत्तराधिकार जैसे दीवानी विवादों पर विशेष ध्यान।
XII. हर साल सार्वजनिक रिपोर्ट – कितने दायर, कितने निपटे, कितने पुराने खत्म, देरी के कारण क्या। सफलता का पैमाना फाइल बंद होना नहीं, नागरिक का समय-खर्च बचना और निष्पक्ष न्याय मिलना हो।
10. सबसे बड़ा मूल्य आम आदमी चुकाता है : जमीन के लिए संघर्षरत गरीब परिवार, संपत्ति विवाद का फैसला देखने को तरसता बुजुर्ग, मुआवजे की राह देखता दुर्घटना पीड़ित, मुकदमा झेलता विचाराधीन आरोपी – सबका जीवन प्रभावित होता है। खर्च सिर्फ फीस नहीं, यात्रा, छुट्टी, दस्तावेज, प्रतीक्षा और मानसिक पीड़ा भी है।
निष्कर्ष : भारतीय न्याय व्यवस्था ने संविधान की रक्षा में बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन सुधार निरंतर जरूरी है। यह काम किसी एक संस्था से नहीं होगा। न्यायपालिका, सरकार, पुलिस, बार और नागरिक – सभी को भूमिका निभानी होगी। गति बढ़ाने के नाम पर गुणवत्ता, निष्पक्षता और अधिकारों से समझौता नहीं होना चाहिए। निर्दोष को बचाना और दोषी को दंड, पीड़ित को न्याय और आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई – यही उद्देश्य है।
न्याय सुधार को सरकारी योजना नहीं, नागरिक की गरिमा से जुड़ा राष्ट्रीय दायित्व समझना होगा। क्योंकि न्याय की प्रतीक्षा में बीतता हर साल किसी की उम्मीद तोड़ता है। जब न्याय की आस में पूरा जीवन गुजर जाए, तो सिर्फ मुकदमा नहीं, उस परिवार का भविष्य और व्यवस्था पर समाज का विश्वास भी प्रभावित होता है। न्याय तभी सार्थक है जब वह निष्पक्ष, सुलभ, किफायती और समय पर मिले।
लेखक : संजय अग्रवाल, सामाजिक चिंतक, नागपुर
स्रोत : राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, भारत सरकार न्याय विभाग, उच्चतम न्यायालय पोर्टल



