Published On : Tue, Jan 23rd, 2018

दलितों के लिए त्रासदी जैसे होते हैं आठवले जैसे नेता

रामदास आठवले इन दिनों यही कर रहे हैं, संक्षित में यही सार है। जो अपने इतिहास, अपने लोगों के त्याग को भूल चुके हैं। वर्तमान में वे मोदी सरकार के समाजिक न्याय व सक्षमीकरण मंत्री हैं। यह विडंबना ही है कि ‘सक्षमीकरण’ मंत्री को सिवाय केबिट मंत्री पद के कोई भी चीज ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं लगती। मानों इस पद ने उनके पर ही काट दिए हों।

भीमा कोरेगांव आंदोलन के बाद दलित नेता के रूप में प्रकाश आंबेडकर एक उभरते हुए नेता के रूप में दिखाई दिए। इस दौरान पुकारे गए महाराष्ट्र बंद के दौरान मुंबई भी थम सी गई थी। मुंबई को पूरी तरह से थामने की शक्ति शिवसेना सुप्रीमो बाबासाहब आंबेडकर के पास ही थी। आंबेडकर के पास इस दौरान मीडिया जिसमें टीवी मीडिया विशेष रूप से दौड़ लगाते हुई दिखाई दी। इस भूचाल का असर आठवले और दिल्ली स्थित उनके ल्युटियन्स के बंगले तक पहुंचा। ऐसे में उन्होंने आननफानन में पुकारे गए बंद को सफल बंद बताना पड़ा। वह इसलिए क्योंकि खुद आठवले के कार्यकर्ता उस बंद के समर्थन में उतरे हुए थे। ऐसे में सवाल जरूर उठता है कि क्या उनके पास कोई विकल्प सच ही शेष रह गए थे क्या?

प्रकाश आंबेडकर ही नहीं, दलित युवाओं का नेतृत्व कर रहे जिगनेश मेवानी भी उन्हें एक प्रतिद्वंद्वी की ही तरह दिखाई दे रहे थे।

यह स्थिति तब है जब अपने आप को दलित नेता कहलानेवाले आठवले भी यह भलीभांति जानते हैं कि चुनाव के दौरान भाजपा ने उन्हें हराने के िलए किस तरह की फील्डिंग लगाई थी और उसके बाद भी वे शानदार ढंग से जीत गए। अमित शाह से लेकर यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ उनके विरोध में प्रचार करते नजर आए थे।

भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद अस्थिरता लाने का दोष उन पर मढ़ा गया। कहा गया कि पुणे के शनिवारवाड़ा में दिए गए उनके बयान से यह स्थिति उपजी। उनके इस बयान के बाद मीडिया का एक दल उनके खिलाफ हो गया, जिससे उनके बोले गए शब्द उन्हें भी भारी पड़ने लगे।

वे यह समझने के िलए तैयार ही नहीं हो रहे हैं कि वे अपने जनाधार से दूर होते जा रहे हैं। महीने भर पहले ही विधायक बननेवाले ने भी अरनब जैसे एंकर का शो उनके रीपल्बिक चैनल से छोड़कर अपने उतावले पन का परिचय दिया था।

न्यूज मिनट की पत्रकार गीता सेशु रीपब्लिक चैनल के शो के इस बहिष्कार को लेकर लिखती हैं, ‘इन कार्यकर्ताओं की ये हरकतें यह सिध्द करती हैं कि मीडिया के नियम केवल पावरफुल पोजिशन वाले ही नहीं कर सकते हैं। इनमें से एक के पास भी कोई भी पावरफुल संवैधानिक संस्था नहीं। उनके पास सोशल मीडिया छोड़कर ना तो कोई सरकारी मीडिया या प्रायवेट या कार्पोरेट मीडिया में ही मंच उपलब्ध है। ये केवल उनके द्वारा किए गए काम ही है जो उन्हें प्रभावशाली बनाते हैं और प्रभुत्व स्थापित करते हैं। यही वजह है कि उन्हें इस बात का पूरा यकीन है कि वे मीडिया के ऑक्सीजन के बगैर भी कैसे अपनी बात प्रभावशाली ढंग से पहुंचा सकते हैं। अब उनके पास अधिकार है कि वे किस मीडिया से संवाद साधना चाहेंगे।

क्या आठवले मेवानी में अपने जवानी के दिनों की झलक नहीं देख पा रहे हैं? उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत दलित पैंथर के ब्रिगेड के रूप में शुरू की थी। यह रिपब्लिकन पार्टी का एक तौर से युवाओं का मिलिटेंड ग्रुप जैसा ही था, जिसका वे नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने यहां तक की मांग उठाई थी कि दलित युवाओं को उनकी आत्मसुरक्षा के लिए अधिकृत रूप से बंदूक रखने की अनुमति दी जाए।

इसके बाद जब आपके लोग आपको सत्ता शक्ति के शीर्ष तक पहुंचा देते हैं और उसके बाद जब आप कहते हैं कि भीमा कोरेगांव घटना को भुलाकर जातिगत एकता के लिए प्रयास किया जाना चाहिए, तो यह कहां तक ठीक है आठवले जी? एक ओर आप संविधान को किसी भी सूरत में ना बदलने की बात करते हैं, दूसरी तरफ आप उच्च जाति के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण देने के िलए संविधान में संशोधन की बात भी कहते फिरते हैं। आप आखिर हैं किस तरफ? उच्च जाति की तरफ या पिछड़ी जातियों की तरफ, आप आखिर हैं क्या?

देश में दलित वर्ग के साथ आज यही दुर्भाग्य है। उनके नेता जिन्हें राजनीतिक, सामाजिक रूप से ऊपर पहुंचाया, जिन्होंने संविधान प्रदत्त सारी सुविधाओं का लाभ लिया। जिन्होंने इसी आरक्षण का लाभ लेते हुए ब्यूरोक्रेसी से लेकर सरकारी विभागों में स्थान पाया, भूल जाते हैं कि उनका आधार क्या है और कौन है और किसके अधिकारों की लड़ाई वे लड़ रहे हैं। रामदास आठवले इस वर्ग के जीवंत उदाहरण हैं।

वे बाबा साहब आंबेडकर द्वारा बताए गए संदेश का पालन भी ना कर पाए जिसमें उन्होंने शिक्षा, संगठन और संघर्ष का अनुपालन करने की सीख दी थी।