Published On : Tue, Apr 17th, 2018

केलीबाग रोड होगा विस्तारित, सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज की याचिका

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नागपुर: केलीबाग रोड के चौड़ीकरण का विरोध करने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दी है। मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ द्वारा 18 अक्टूबर 2016 को दिए गए फ़ैसले को दिए गए फ़ैसले को ही जारी रखा है। हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ स्थानीय दुकानदार,निवासी और मार्ग में पड़ने वाली अलफूद्दीन मस्जिद सुप्रीम कोर्ट गए थे। बीते दो वर्षो से मामले की सुनवाई शुरू थी।

इस मामले की कुल 12 सुनवाईयों के बाद मंगलवार को फ़ाइनल हियरिंग के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिकर्ताओं की याचिका को ख़ारिज कर दिया। सीए रोड से महल के व्यस्त ईलाके से होकर गुजरने वाले केलीबाग रोड व्यस्त व्यसायिक इलाका है। फ़िलहाल 15 मीटर के रोड को 24 मीटर तक चौड़ीकरण का मामला वर्ष 2008 से शुरू है। प्रशासन द्वारा मार्ग के चौड़ीकरण का प्रस्ताव लाये जाने के बाद 289 दुकानदारों के साथ स्थानीय निवासी और रोड के बग़ल में बनी मस्जिद से जुड़े लोग वर्षो से अदालत में मामला लड़ रहे थे लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत के फ़ैसले से उन्हें निराशा ही हाँथ लगी। रामदास एंड सन्स वर्सेस राज्य सरकार इस मामले की मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई अंतिम सुनवाई में अदालत ने लगभग 45 मिनट तक याचिकाकर्ताओं की दलीले सुनी।

लगभग 30 मिनट का समय दुकानदारों को अपना पक्ष रखने को दिया गया जबकि 15 मिनट का वक्त मस्जिद अलफूद्दीन की तरफ से याचिकाकर्ता अताउर रहमान को दिया गया। रहमान ने अदालत में दलील दी की सड़क की चौड़ाई बढ़ाए जाने के कारण मस्जिद को तोडा जायेगा। चूँकि यह मस्जिद हैरिटेज ग्रेड एक की श्रेणी में है इसलिए इसका संरक्षण होना चाहिए। इसी मार्ग पर तीन मंदिरो को लेकर मार्ग चौड़ीकरण प्लान में बदलाव किया गया है जिसका फायदा मस्जिद को भी होना चाहिए। याचिकर्ताओं ने पुख़्ता तरीक़े से अदालत में अपना पक्ष रखने का प्रयास किया जिसमे वो सफ़ल नहीं हो पाए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद रोड के चौड़ीकरण का मार्ग एक तरह से प्रशस्त हो गया है।

हाईकोर्ट से भी नहीं मिली थी राहत
गौरतलब हो की मार्ग के चौड़ीकरण को लेकर बने प्लान के विरोध में स्थानीय दुकानदार और निवासियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। राज्य सरकार वर्सेस अन्य मामले में वर्ष 2016 में जस्टिस भूषण गवई और वी एम देशपांडे की दोहरी बेंच ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को सुनने के बाद मामला ख़ारिज कर दिया था। इस फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट गया जहाँ दो वर्ष चली सुनवाई के बाद निचली अदालत का निर्णय जारी रहा।