Published On : Wed, Oct 28th, 2026
By Nagpur Today Nagpur News

कराले गुरुजी की ‘दूसरी पसंद’ ने पलटा नागपुर का चुनावी नतीजा, कांग्रेस के अभिजीत वंजारी जीते

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60 साल पुराने भाजपा के गढ़ में बड़ा उलटफेर, नितेश कराले के वोटों ने बदला मुकाबले का रुख; सुधाकर कोहले की बढ़त टूटी

कराले गुरुजी की ‘दूसरी पसंद’ ने पलटा नागपुर का चुनावी नतीजा, कांग्रेस के अभिजीत वंजारी जीतेनागपुर, 28 अक्टूबर। नागपुर विभागीय पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र के हाई-वोल्टेज चुनाव में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया। कांटे की टक्कर में वंजारी की जीत का सबसे अहम मोड़ निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले उर्फ कराले गुरुजी की दूसरी पसंद के वोट बने, जिन्होंने मुकाबले का रुख बदल दिया।

दूसरी पसंद के वोटों से पलटा पूरा खेल

मतगणना के शुरुआती दौर में पहली पसंद के वोटों की गिनती में भाजपा पिछड़ रही थी। हालांकि, बाद के राउंड में सुधाकर कोहले ने करीब 4,000 वोटों की बढ़त बना ली। 30 उम्मीदवारों की मतगणना पूरी होने के बाद उनकी बढ़त बढ़कर लगभग 5,000 वोटों तक पहुंच गई।

लेकिन अंतिम तीन उम्मीदवारों के दूसरी पसंद के वोटों की गिनती शुरू होते ही तस्वीर बदलने लगी। कोहले की बढ़त घटकर करीब 1,200 वोटों पर आ गई। उस समय नितेश कराले के लगभग 14,000 वोटों की गिनती बाकी थी।

कराले के समर्थक मतदाताओं की दूसरी पसंद के वोट बड़े पैमाने पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी के पक्ष में गए। इससे कोहले की बढ़त समाप्त हो गई और वंजारी ने जीत दर्ज कर ली।

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भाजपा के गढ़ में बड़ा झटका

नागपुर पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। गंगाधरराव फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी जैसे नेताओं के राजनीतिक प्रभाव वाले इस क्षेत्र में पार्टी को मिली हार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

पिछले चुनाव में अनिल सोले को टिकट नहीं दिए जाने के बाद भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इस बार पार्टी ने कार्यकर्ताओं की नाराजगी के बावजूद सुधाकर कोहले को उम्मीदवार बनाया। इससे संगठन के भीतर असंतोष बना रहा।

अनिल सोले की नाराजगी और बगावती रुख को देखते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को स्वयं उनके घर जाकर उन्हें मनाने की कोशिश करनी पड़ी। चुनाव में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर थी। मुख्यमंत्री ने भी दो दिन नागपुर में रहकर शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और व्यावसायिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें की थीं।

बढ़े हुए मतदान प्रतिशत के आधार पर भाजपा को उम्मीद थी कि पहली पसंद के वोटों के सहारे पार्टी जीत हासिल कर लेगी। हालांकि, मतगणना के अंतिम चरण में दूसरी पसंद के वोटों ने पूरा समीकरण बदल दिया।

बागियों की नाराजगी पड़ी भारी?

इस चुनावी नतीजे ने भाजपा के सामने संगठनात्मक असंतोष और उम्मीदवार चयन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कार्यकर्ताओं की नाराजगी के बावजूद उम्मीदवार पर कायम रहने का फैसला पार्टी को महंगा पड़ा या नहीं, इस पर अब राजनीतिक चर्चा तेज होने की संभावना है।

नितेश कराले के वोटों ने यह भी दिखाया कि पदवीधर चुनाव जैसे मुकाबलों में केवल शुरुआती बढ़त निर्णायक नहीं होती। दूसरी पसंद के वोट अंतिम नतीजे को पूरी तरह बदल सकते हैं।

नागपुर में भाजपा के मजबूत राजनीतिक आधार के बावजूद कांग्रेस की इस जीत ने साफ कर दिया कि चुनावी रणनीति, संगठनात्मक एकजुटता और मतदाताओं की प्राथमिकताएं किसी भी मुकाबले का परिणाम बदल सकती हैं।

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