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Published On : Fri, May 24th, 2019
nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

1957 के बाद पहली बार सिंधिया राजघराने का कोई सदस्य चुनाव हारा, गुरु-चेले की थी लड़ाई!

ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से हार गये हैं. उनको हराने वाला उनका ही नायब है. कभी सिंधिया के लिए काम करने वाले के पी यादव ने 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में खुद के लिए टिकट मांगा तो नहीं मिला. भाजपा ने टिकट दे दिया पर यादव हार गये. भाजपा ने इस बार सिंधिया के खिलाफ लोकसभा में टिकट दे दिया. और के पी यादव ने सिंधिया को बुरी तरह हराया है. तस्वीर में देख सकते हैं कि सिंधिया के साथ सेल्फी लेते थे कभी के पी यादव.

शिवपुरी /गुना। 1957 के बाद पहली बार सिंधिया राजघराने का कोई सदस्य चुनाव हारा है। यही नहीं, पहली बार सिंधिया परिवार का कोई सदस्य गुना लोकसभा सीट से चुनाव हारा है। क्योंकि बदले हुए हालात में भी सिंधिया राजघराने का सदस्य यहां से चुनाव जीतता रहा, लेकिन इस बार ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना लोकसभा सीट से चुनाव हार गए।

बता दें कि पार्टी कोई भी रही हो लेकिन गुना लोकसभा सीट पर सिंधिया परिवार का ही कब्जा रहा है लेकिन 2019 में पहली बार ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां से चुनाव हार गए। इनसे पहले 1957 में यहां हुए पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर सिंधिया राजघराने की महारानी विजिया राजे ने पहला चुनाव लड़ा।उसके बाद 1971 में विजयाराजे के बेटे माधवराव सिंधिया ने भी पहला चुनाव यहीं से जंनसंघ के टिकट पर लड़ा था और जीता भी था। माधवराव सिंधिया के निधन होने के बाद उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राजनीतिक करियर की शुरुआत 2002 में हुए उपचुनाव में यहीं से की। पिछले 4 चुनावों से इस सीट पर कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया को ही जीत मिलती रही लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में वे अपने प्रतिद्वंदी और भाजपा उम्मीदवार केपी यादव से चुनाव हार गए।

गुरु-चेले की थी लड़ाई!

कभी सिंधिया के सांसद प्रतिनिधि रहे केपी यादव 2019 लोकसभा चुनाव में जैसे ही भाजपा की ओर उम्मीदवार बने, वो चर्चा के केन्द्र में आ गए, क्योंकि सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शनी राजे सिंधिया ने ट्वीट कर कहा था कि जो कल तक महाराज के साथ सेल्फी लेने के सिंधिया का इंतजार करता था, वह अब गुना में उनको चुनौती देगा? इस बयान के बाद से ही इस सीट पर गुरु-चेले की लड़ाई परवान पर चढ़ी। इस लड़ाई में चेला गुरु पर भारी पड़ गया और 1957 के बाद पहली बार यह सीट सिंधिया राजघराने के हाथ से निकल गई।

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