
नागपुर: हिंदी प्रकाशन क्षेत्र के प्रमुख संस्थानों में शामिल प्रभात प्रकाशन जनवरी 2027 में लेखक रोशन भोंडेकर की हिंदी पुस्तक ‘जीवन की पहली पाठशाला – माता-पिता से मिली जीवन की राह’ प्रकाशित करने जा रहा है। पुस्तक का केंद्र माता-पिता के जीवन, उनके संघर्ष, त्याग, पारिवारिक जिम्मेदारियों और बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में उनकी भूमिका है।
पुस्तक की मूल अवधारणा इस विचार पर आधारित है कि व्यक्ति की प्रारंभिक शिक्षा केवल विद्यालय से नहीं, बल्कि परिवार से शुरू होती है। बोलना, चलना और व्यवहार सीखने से लेकर निर्णय लेने, कठिन परिस्थितियों का सामना करने और सामाजिक मूल्यों को समझने तक माता-पिता और परिवार का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में लंबे समय तक बना रहता है।
लेखक की पारिवारिक पृष्ठभूमि भंडारा जिले के तुमसर और नागपुर क्षेत्र से जुड़ी है। पुस्तक में इन्हीं पारिवारिक अनुभवों और स्मृतियों के माध्यम से माता-पिता के जीवन को समझने का प्रयास किया गया है। इसमें उन परिस्थितियों का भी उल्लेख है, जिनमें सीमित संसाधनों के बीच माता-पिता बच्चों की शिक्षा और बेहतर भविष्य को प्राथमिकता देते रहे।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें बचपन की उन सामान्य प्रतीत होने वाली घटनाओं और अनुभवों को जीवन की बाद की समझ से देखने का प्रयास किया गया है। माता-पिता के फैसले, कठिन समय में उनका धैर्य, परिवार के प्रति जिम्मेदारियां और बच्चों के लिए किए गए समझौते अक्सर उस समय पूरी तरह समझ में नहीं आते, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनका महत्व स्पष्ट होता है।
माता-पिता की भूमिका पर केंद्रित यह विषय केवल एक परिवार की कहानी तक सीमित नहीं है। भारत के अनेक परिवारों में अगली पीढ़ी के भविष्य के लिए माता-पिता द्वारा किए गए व्यक्तिगत त्याग और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करने की परंपरा रही है। इस दृष्टि से पुस्तक व्यक्तिगत स्मृतियों के माध्यम से व्यापक पारिवारिक अनुभवों को दर्ज करने का प्रयास करती है।
पुस्तक में लेखक ने अपने माता-पिता के जीवन और उनसे मिली सीखों को उनके जीवनकाल में ही शब्दों में संजोने का प्रयास किया है। यह पक्ष पुस्तक को केवल संस्मरणात्मक लेखन तक सीमित न रखते हुए पीढ़ियों के बीच संबंधों और जीवन मूल्यों पर विचार का आधार देता है।
बदलती जीवनशैली और तेज होती दिनचर्या के बीच परिवार के साथ संवाद और समय को लेकर होने वाले बदलाव भी इस विषय को समकालीन संदर्भ देते हैं। ऐसे समय में माता-पिता की भूमिका, पारिवारिक संस्कार और अनौपचारिक शिक्षा के महत्व पर केंद्रित लेखन सामाजिक स्तर पर परिवार की बदलती भूमिका को समझने का अवसर प्रदान करता है।
हिंदी साहित्य में प्रभात प्रकाशन की भूमिका
‘जीवन की पहली पाठशाला’ का प्रकाशन ऐसे संस्थान से हो रहा है, जिसकी हिंदी पुस्तक प्रकाशन में कई दशकों की उपस्थिति रही है। प्रभात प्रकाशन की स्थापना 1950 में मथुरा में श्याम सुंदर ने की थी और 1958 में दिल्ली स्थानांतरित होकर संस्थान ने अपनी प्रकाशन गतिविधियों का विस्तार किया। प्रकाशक के अनुसार, अब तक संस्थान ने साहित्य की विभिन्न विधाओं और विषयों में हजारों पुस्तकों का प्रकाशन किया है।
प्रभात प्रकाशन के प्रकाशन क्षेत्र में साहित्य, कथा, इतिहास, मानविकी, व्यक्तित्व विकास, बाल साहित्य, विज्ञान और अन्य विषय शामिल रहे हैं। संस्थान की सूची में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, अटल बिहारी वाजपेयी, सुधा मूर्ति, चेतन भगत, दीपक चोपड़ा, रॉबिन शर्मा, वर्गीज कुरियन और आर.ए. माशेलकर जैसे चर्चित नाम शामिल रहे हैं।
हिंदी साहित्य के संरक्षण और पाठकों तक साहित्यिक सामग्री पहुंचाने की दिशा में भी प्रकाशन समूह की गतिविधियां रही हैं। संस्थान ने 1995 से ‘साहित्य अमृत’ नामक हिंदी साहित्यिक मासिक का प्रकाशन जारी रखा है। इसके कैटलॉग में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ जैसे महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथों के नए संस्करण भी शामिल हैं।
इसी व्यापक प्रकाशन परंपरा के बीच ‘जीवन की पहली पाठशाला’ जनवरी 2027 में पाठकों के सामने आएगी। पुस्तक का विषय परिवार, माता-पिता और जीवन मूल्यों से जुड़े उन अनुभवों पर केंद्रित है, जिन्हें अक्सर निजी स्मृतियों का हिस्सा मानकर दर्ज नहीं किया जाता। पुस्तक इन्हीं अनुभवों को हिंदी में साहित्यिक रूप देने का प्रयास करती है।




