Published On : Thu, Dec 27th, 2018

कुशलता पूर्वक कर्म करना ही योग हैः आचार्यश्री सुधांशु महाराज

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महावीर ग्राउंड में भव्य विराट भक्ति सत्संग जारी

नागपुर: श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान कहते हैं कि इस संसार में मनुष्य के उत्थान और विनाश दोनों का कारक मन ही है। जिस प्रकार एक विशाल घर की सुरक्षा एक छोटी सी चाबी के हाथ में होती है उसी तरह मनुष्य के शरीर और इस संसार से जुड़े सभी क्रिया-कलापों की जिम्मेदारी एक छोटे से मन की होती है। इसलिए हर कहीं मन कारणीभूत है। जिसने मन को जीत लिया उसने इस शरीर और संसार को जीत लिया। सद्विचार और भक्ति दोनों का मिलन हो तो जीवन सार्थक हो जाता है। मन एक शक्तिशाली शरीर की उर्जा है। यदि सही दिशा में उपयोग किया तो यही मन भवबंधन से मुक्ति दिला सकता है। मन को संसार की ओर घुमाओगे तो उसका ताला बंद हो जाएगा। मन की गति को संभालना आवश्यक है। इसे ईश्वर की ओर मोड़िये। भक्ति और सत्संग के द्वारा ही मन परमात्मा की ओर मोड़ा जा सकता हैै।

उक्त उद्गार विश्व जागृति मिशन के तत्वावधान में आयोजित पांच दिवसीय विराट भक्ति सत्संग के अवसर पर आचार्यश्री सुधांशु महाराज ने व्यक्त किए। विराट भक्ति सत्संग का भव्य आयोजन महावीर मैदान, गणेश नगर, ग्रेट नाग रोड में किया जा रहा है। सत्संग का समय सुबह 9 से 11.30 और शाम को 4 से 6.30 बजे तक रखा गया है। यह आयोजन 30 दिसंबर जारी रहेगा।

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आचार्यश्री ने आगे कहा कि श्रीमद् भगवद्गीता के ज्ञान प्रसंग का आरंभ युद्ध भूमि से होता है। अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कर दिया। इस समय नेत्रहीन धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि हे संजय मेरे और पांडव के पुत्रों ने क्या किया। युद्ध की पृष्ठभूमि मेरे और पराये की भावना से शुरू होती है। जहां मन में मेरे और पराये का भाव आ जाता है वहां युद्ध प्रारंभ हो जाता है। युद्ध की भूमिका पहले मन में बनती है। गीता जन्म-मरण के बंधन को सुधारने वाली है यह दिव्य सत्ता द्वारा दिया गया आदेश है। गीता में श्रीकृष्ण का संदेश है कि कुशलता और कर्म के द्वारा जीवन को सार्थक करो। जीव के शरीर के साथ जब आत्मा जुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है। परमात्मा ने हमें इस संसार में कर्म कर अपना भाग्य बनाने के लिए भेजा है। कर्म करने और जीवन जीने की प्रबल इच्छा से कार्य करो। निष्काम भाव से कर्म करो। कर्म इस तरह करो कि संसार के बंधनों में न बंध पाओ।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमारे पास आंखें हंै पर हमने ज्ञान की आंखें बंद कर रखी हैं और यही विवाद का कारण भी बन जाता है। मोह बहुत भयंकर चीज है। मोह से पराई चीज भी अपनी मान ली जाती है। मोह के वशीभूत होकर पक्षपात करने लगते हैं तब महाभारत की स्थिति पैदा होती है। वैसे मोह भी प्रेम का ही एक रूप है लेकिन बहता निर्मल पानी ‘प्रेम’ है और रोका हुआ जल ‘मोह’ के समान है, जो सिर्फ लेना जानता है। मोह रुलाने वाला भाव है। जितना मोह रहेगा उतना की कष्ट दुनिया छोड़ने में होगा। जो मद और मोह दोनों को हर ले वही मदन-मोहन हैं। मोह जाल को तोड़ने व मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करने का कार्य श्रीमद् भागवत गीता करती है। जैसे जैसे सफलता अर्जित करें अपने भीतर मद व मोह पर काबू भी पाने का भी प्रयत्न करें।

आज प्रवचन से पूर्व पूजन व माल्यार्पण मुख्य यजमान दिलीप मुरारका व परिवार, महादेव कामडे, कैलाश गौतम दंपति, नासिक मंडल के नारायणराव भंडारकर, राम गावंडे, शिरीष गंपावार, शंकरसिंह परिहार, श्यामलाल वर्मा, जयेश मांडले, प्रवीणा मांडले, गोपाल गोयल, अजीत सारडा, अशोक खंडेलवाल, जगमोहन खंडेलवाल, दामोदर राउत, बंसल प्रधान, प्रेमशंकर चैबे, संजय सव्वालाखे, विजय कुमार जैस्वाल, श्रीकांत जैसवाल, राजू बाराई, सुनीता पोल, बेदाराम तारवानी, कुमारी भारती, राम आचार्य आदि ने किया।

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