
Representational Pic
नागपुर: नागपुर में कांग्रेस शहर कार्यकारिणी की घोषणा के पहले पार्टी एकता का नारा बुलंद किया गया था लेकिन अब पार्टी में अन्तर्कलह अब सतह पर आ गई है। जिस तरह का माहौल कांग्रेस में बन रहा है उससे नागरिकों में अलग अलग तरह की चर्चाएं हो रही हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने आशंका जताई है कि इसका प्रभाव अगले साल मार्च में होने वाले मनपा चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है। विरोधी खेमा यह अनुमान लगा रहा है कि अगर काँग्रेस का यही हाल रहा तो पुनः भाजपा सत्ता पर काबिज हो जाएगी। जानकारों की राय में अगर कांग्रेस सत्ता में आती भी है तो वह अपने बल पर नहीं बल्कि भाजपा की गलतियों से मनपा चुनाव जीतेगी।
कांग्रेस की शहर कार्यकारिणी की घोषणा के ३-४ दिन बाद एक गुट के ३२ पदाधिकारियों ने अपने ही नेता को अपने ही क्षेत्र के विरोधी कांग्रेसियो को पदाधिकारी बनाये जाने के नाम पर इस्तीफा दे दिया। सूत्रों का दावा है कि यह सारी गतिविधि प्रपंच है। अगर इस्तीफा देना ही था तो जिसने पदाधिकारी बनाया याने शहर या फिर प्रदेश अध्यक्ष को देना चाहिए था। जानकार मानते हैं कि विरोध करने की बजाय अगर इन्होंने स्थिति को सामान्य ढंग से लिया होता तो क्षेत्र में पार्टी बढ़ती व शिष्टाचार भी दिखता। कौन क्षेत्र में प्रभावी है वह कार्यो से आंकलन हो तो पार्टी के लिए चिंतन का विषय बनाया जा सकता है, फिर पार्टी तय करती की किसे कायम रखा जाये या किसे बढ़ोतरी दी जाये या फिर किसकी सलाह को गंभीरता से ली जाये।
वही दूसरी ओर शहराध्यक्ष या प्रदेशाध्यक्ष को चुनाव पूर्व शहर कार्यकारिणी की घोषणा करते वक़्त सभी स्थानीय नेताओं की सिफारिशों को प्राथमिकता देते हुए शहर कार्यकारिणी की घोषणा करना चाहिए था। फिर जिम्मेदारी देकर उसकी कार्य-कुशलता देख उस पदाधिकारी का भविष्य तय करना चाहिए था.लेकिन “एक म्यान में दो तलवार” वाली कहावत के तर्ज पर पार्टी अन्तर्गत तनातनी शहरवासियों के लिए मजाक बन गई। आज यह शुरुआत है कि उत्तर सह पूर्व में विरोध शुरू है,कल कही और शुरू होगा। इस विरोधाभास के मद्देनज़र प्रदेश अध्यक्ष यह भी आदेश दे सकते है कि विरोधकर्ताओं को कार्यकारिणी से निकल उसकी जगह दूसरों को मौका दो। ऐसा हुआ तो निसंदेह कांग्रेस का ही नुकसान होंगा।
उल्लेखनीय यह भी है कि वर्षो से आजतक शहर कांग्रेसियों ने डमी शहराध्यक्ष का अनुभव लिया है। वे किसी की नियुक्ति या पदमुक्त करने की कभी कोशिश नहीं की। शायद इसलिए कि वे सक्षम नहीं थे। लेकिन इस बार शहराध्यक्ष दमखम वाला बना है, जिसे अच्छी तरह प्रदेशाध्यक्ष ने परख भी लिया है। फिर जब ऐसा अध्यक्ष होंगा तो वह अपने खास को खास पद दिलवाने का हक़ तो रखता ही है, और दिलवाया। शायद शहराध्यक्ष की इतनी सक्रियता कांग्रेसी को हजम नहीं हो पा रही, यह भी कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं है। समय रहते सभी दिग्गज उक्त तर्क को समझने की कोशिश नहीं की तो वह दिन दूर नहीं जब विरोधियों का ही कहा सच साबित हो जायेगा।
– राजीव रंजन कुशवाहा
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