Published On : Wed, Mar 28th, 2018

भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग-एक अति गंभीर घटना विकासक्रम!

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एक अति गंभीर पुष्ट खबर कि भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्र के खिलाफ विपक्ष महाभियोग लाने की तैयारी कर रहा है।पूरी की पूरी न्याय-व्यवस्था को कटघरे में में खड़ी करने वाली इस खबर से पूरा देश हतप्रभ है।क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कुछ ऐसे संगीन ज़ुर्म किए हैं कि उनके खिलाफ महाभियोग लाने की जरूरत पड़ गई?किसी भी लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष न्यायपालिका पहली शर्त है।किसी भी दबाव/प्रभाव से मुक्त न्यायपालिका ही संविधान-कानून के दायरे में अपेक्षित न्याय निष्पादित कर सकती है।इसीलिए कहा गया है कि न्यायपालिका को किसी भी प्रकार के संदेह से ऊपर होना ही चाहिए।यही नहीं, न्याय की मूल अवधारणा भी बार-बार चिन्हित की जाती रही है कि न्याय न केवल हो, बल्कि वह होता हुआ दिखे भी।लेकिन, यक्ष प्रश्न सामने कि क्या ऐसा हो रहा है?

विडंबना के रूप में जवाब न्यायपालिका की ओर से ही आया कि,’.. नहीं,न्यायपालिका में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है।’इतना ही नहीं, इससे भी आगे बढ़ते हुए सर्वोच्चन्यायलाय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने यहाँ तक टिप्पणी कर दी कि “लोकतंत्र खतरे में है।”किसी भी लोकतंत्र के लिए ऐसी स्थिति असहनीय ही मानी जायेगी।ऐसे में देश मौन कैसे रह सकता है?

याद करें, जब सर्वोच्चन्यायलाय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश मीडिया से रूबरू हो अपनी व्यथा व्यक्त कर रहे थे, तब मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्र के संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि,’इसका फैसला हम जनता पर छोड़ते हैं”

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ऐसे में जनता चुप कैसे रहे?निर्वाचित जन प्रतिनिधि अब महाभियोग के रूप में मामले को उठाने की तैयारी में हैं, तो अपने दायित्व का निर्वाह ही कर रहे हैं।महाभियोग का आधार भी चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के वक्तव्य को ही बनाये जाने की खबर है।भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में जुड़ने जा रहे इस काले अध्याय से सर्वाधिक प्रभावित होगा हमारा लोकतंत्र।भारतीय न्यायपालिका का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है।यह वही न्यायपालिका है जिसने देश के प्रधानमंत्री के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था।यह वही न्यायपालिका है जिसने संसद द्वारा पारित प्रथम संविधान संशोधन को निरस्त कर दिया था।अनेक उदाहरण हैं जो हमें गौरवान्वित करते हैं।इस पार्श्व में जब देश के प्रधान न्यायाधीश के ऊपर महाभियोग लाने की मजबूरी सामने आती है, तो पूरे देश के लिए चिंतन अपेक्षित है।और ये स्वाभाविक भी है।

बावजूद इसके हम चाहेंगे कि ऐसी दुःखद स्थिति को टालने के प्रयास किए जाएं।पहल न्यायपालिका, बल्कि स्वयं भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्र करें।उनकी कार्यपद्धति पर चार न्यायाधीशों द्वारा खड़े किए गए सवालों के बाद दो माह गुजर गए।कोई संतोषजनक समाधान सामने नहीं आया है।ऐसी स्थिति को देश कैसे स्वीकार करेगा?न्यायाधीशों को ईश्वर माना जाता है।फिर अगर ईश्वर को कटघरे में खड़ा करने की नौबत आती है तो जवाब तो ‘ईश्वर’को ही देना पड़ेगा!देश नहीं चाहेगा कि उन्हें कटघरे में खड़ा किया जाए।इसलिए, अपेक्षा है कि बगैर और समय गवाएं मुख्य न्यायाधीश पहल कर हर शंका का सार्वजनिक समाधान कर दें!

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