Published On : Mon, Jun 19th, 2017

बेटे के हाथों इज़्ज़त का जनाज़ा निकलवा कर कैसा लगता है सहवाग?

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इंडिया मैच हार गई है. वो भी बड़े मार्जिन से. 180 रनों से. मने ये सिर्फ हारना नहीं है बल्कि ज़ख्मों पर मुट्ठी भर के नमक मलना है. इस हार के बाद यूं तो मातम का सा नज़ारा है. इस करारी हार से चाहे जितना दिल टूटा हो, एक बात की ख़ुशी है मुझे. सहवाग जैसे वाचाल शख्स के मुंह पर करारा तमाचा लगा है इस रिजल्ट से. पाकिस्तान को बेटा-बेटा कह के अपमानित करते रहने वाले सहवाग को अपने खेल से शानदार जवाब दिया है पाकिस्तानी टीम ने. मैं चाहता हूं कोई मीडियाकर्मी वीरेंद्र सहवाग से जा मिले. कैमरा उनके मुंह पर ज़ूम करते हुए उनसे पूछे,

“बेटे के हाथों ज़लील होकर कैसा लग रहा है साहब?”

और फिर कैमरा वही टिकाए रखे. पूरी दुनिया उनके चेहरे की रंगत को उड़ता हुआ देखे.

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हम भारतीयों में एक कहावत बहुत मशहूर है. अहंकार तो रावण का भी नहीं रहा. आज सहवाग को ये सबक अच्छी तरह याद हो जाएगा. ये भी हो सकता है कि ऐसा कुछ न हो. कुछ लोगों की चमड़ी समय के साथ मोटी होती चली जाती है. उनको किसी बात से फर्क नहीं पड़ता. हो सकता है सहवाग उन्हीं लोगों में से हो. वैसे भी गुरमेहर को पाकिस्तान समर्थक बता कर ट्रोल करने वाले सहवाग, खुद पूरी बेशर्मी से इंडिया-पाक मैच में कमेंट्री करते नज़र आते हैं. मोटी चमड़ी के बिना मुमकिन है ये भला!

ये सहवाग का बड़बोलापन ही था कि राशिद लतीफ़ जैसे खिलाड़ियों को आज भारत पर हंसने का मौक़ा मिल रहा है. जितनी इज्ज़त उन्होंने क्रिकेट में मैदान में मेहनत कर के अपने देश के लिए कमाई थी, उसे चंद घटिया बातें कह के खुद ही नीलाम कर दिया. इस लिहाज़ से सहवाग मूर्खता का एवरेस्ट छू गए हैं.

अंग्रेजी में एक कहावत है. One should always keep his words sweet and soft, you never know when you may have to eat them back. इसका खालिस हिंदुस्तानी तर्जुमा कुछ यूं हुआ कि शाब्दिक उल्टियां करने से पहले सोच लेना चाहिए, क्या पता कब आपको उसे वापस पीना पड़ जाए! सहवाग के साथ यही हो रहा है. और सही हो रहा है. जो आदमी मैदान में बरसों बिताने के बाद भी स्पोर्ट्समैन स्पिरिट नहीं सीख पाया, उसका यूं तबियत से ज़लील होना तो बनता है. जिसने खेल को खेल की तरह लेना सीखा ही नहीं, उसका रिकॉर्ड चाहे कितना ही शानदार हो, है तो वो शख्स ज़ीरो ही.

वीरेंद्र सहवाग जैसे सूरमा इतनी सिंपल सी बात नहीं समझ पाते कि खेल में कुछ भी हो सकता है. और क्रिकेट का खेल तो वैसे भी मशहूर है अपनी अनिश्चितताओं के लिए. यहां अंडरडॉग्स के हाथों बड़े किले ध्वस्त हो जाना कोई अनोखी घटना नहीं है. यहां बस आपका दिन होना चाहिए और कोई भी किसी को भी हरा सकता है. आज पाकिस्तान का दिन था. और देख लो उसने क्या किया! जिस टीम को लोग टूर्नामेंट शुरू होने के पहले से ही खारिज कर रहे थे, वो आज चैंपियन है. उस टीम को हरा के जो फेवरेट मानी जा रही थी.

बांग्लादेश को सेमीफाइनल में हराने के बाद सहवाग को लगा होगा कि उनका बाप-बेटा-पोता वाला जोक हिट है. पोते को रास्ते से हटा कर वो बेटे को सबक सिखाना चाहते थे. बेटे ने चौराहे पर कपड़े उतरवा दिए. काश उन्होंने बांग्लादेश के कप्तान मशरफे मुर्तज़ा की बातें सुन ली होती. मुर्तज़ा ने खेल को देशभक्ति से जोड़ने वाली बात पर कहा था,

“हां, मैं क्रिकेट खेलता हूं. लेकिन क्या मैं किसी की जान बचा सकता हूं? क्या गेहूं का एक दाना उगा सकता हूं? क्या एक ईंट जोड़ सकता हूं? हीरो बनाना है तो डॉक्टर को, किसान को, मज़दूर को बनाइए. मैं काहे का हीरो हूं? मैं आपका मनोरंजन करने के पैसे लेता हूं. आपका चहेता परफॉर्मर हूं, जैसे फिल्मी सितारे होते हैं. मुक्ति योद्धाओं ने गोलियों का सामना पैसे के लिए नहीं किया. वे हीरो थे, परफॉर्मर नहीं. हीरो क्रिकेटर रकीबुल हसन था, जो मुक्तियुद्ध के पहले ही अपने बल्ले पर जय बांग्ला लिख कर मैदान पर उतरा था. वे कौन अहमक हैं, जो देशभक्ति को क्रिकेट से जोड़ कर खेल बना रहे हैं. वे ख़तरनाक खिलाड़ी हैं. वे सच्चे देशभक्तों की बेइज़्ज़ती करते हैं.”

वो अहमक वीरेंद्र सहवाग है मुर्तज़ा भाई!

सहवाग मुर्तज़ा से बड़े खिलाड़ी हैं. बहुत बड़े. लेकिन इंसानियत के पैमाने पर, समझदारी के स्केल पर उनका स्कोर मुर्तज़ा के आगे कही नहीं ठहरता. यहां आकर सहवाग बहुत छोटे नज़र आते हैं. बिल्कुल टुच्चे. मोहल्ले के उस लफंडर लड़के की तरह जो बाइक के स्टंट तो यकीनन कमाल के करता है, लेकिन लोगों से पंगे लिए बगैर, उन्हें गालियां दिए बगैर जिसके हलक से खाना नहीं उतरता.

सहवाग के घमंड का यूं चकनाचूर होना बहुत ज़रूरी था. आज सहवाग पर न जाने कौन-कौन हंस रहा होगा. राशिद लतीफ़, पूरी पाकिस्तानी टीम, पूरा पाकिस्तान मुल्क, यहां तक कि सहवाग के साथी कमेंटेटर्स भी. ठीक ही हुआ. एक मसखरे आदमी को इस दवाई का डोज़ मिलना ही चाहिए था.

रही बात क्रिकेट में हार की तो आज हारे हैं, कल फिर जीत जाएंगे. कुछ फैसले गलत हुए आज. कुछ किस्मत खराब रही. हार गए. हार-जीत लगी रहती है दोस्तों. हौसला बढ़ाइए अपने खिलाड़ियों का. और पूरी दुनिया को दिखा दीजिए कि हम खेल को खेल की तरह लेना जानते हैं. इस हार से बड़ी शर्मिंदगी वाली बात तो ये है कि हमारे मुल्क में वीरेंद्र सहवाग जैसे लोग रहते हैं.

हैप्पी फादर्स डे सहवाग!

… As published in The Lallantop

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