
नागपुर – नागरिकों के आवेदन और शिकायतों पर वर्षों तक निर्णय नहीं लेने वाले सरकारी अधिकारियों के रवैये पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने कड़ी नाराजगी जताई। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकारी अधिकारी जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। अधिकारियों की लापरवाही के कारण नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, जिससे न्यायालय का भी अनावश्यक समय खर्च होता है।
न्यायमूर्ति अनिल पानसरे और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की खंडपीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता दिलीप ठाकरे ने अपनी सेवा संबंधी मांग को लेकर अक्टूबर 2018 से नवंबर 2023 के बीच नागपुर संभागायुक्त और जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को कई आवेदन दिए थे। इसके बावजूद लंबे समय तक उनके आवेदनों पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। करीब छह वर्ष तक प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई नहीं होने के बाद ठाकरे को हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा।
देरी पर रोक के लिए कानून, फिर भी कार्रवाई नहीं
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रशासनिक कामकाज में होने वाली अनावश्यक देरी पर भी सवाल उठाए। खंडपीठ ने कहा कि सरकारी अधिकारियों के समय पर काम नहीं करने के कारण नागरिकों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है। ऐसी याचिकाओं से अदालत का महत्वपूर्ण समय भी खर्च होता है।
न्यायालय ने कहा कि प्रशासनिक देरी रोकने के लिए ‘महाराष्ट्र शासकीय कर्मचारियों के स्थानांतरण का नियमन और शासकीय कर्तव्यों में विलंब की रोकथाम अधिनियम’ लागू है। इसके बावजूद दोषी अधिकारियों के खिलाफ कानून की धारा 10(3) के तहत कार्रवाई नहीं की जाती। इससे यह कानून प्रभावी कार्रवाई के बजाय केवल कागजों तक सीमित रह जाने की स्थिति में पहुंच गया है।
ग्राम विकास सचिव के रवैये पर भी नाराजगी
न्यायालय ने 31 अगस्त को ग्राम विकास विभाग के प्रधान सचिव को मामले की स्वयं जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। हालांकि, सचिव ने मामले की स्वयं जांच करने के बजाय उन्हीं जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को जांच के निर्देश दे दिए, जिनके अधीन संबंधित अधिकारी काम कर रहे थे।
इस रवैये पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई और सचिव से जवाब मांगा।
6 अक्टूबर तक हलफनामा पेश करने का आदेश
खंडपीठ ने ग्राम विकास विभाग के सचिव को 6 अक्टूबर तक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। इसमें सचिव को स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने हाईकोर्ट के 31 अगस्त के आदेश के अनुसार मामले की स्वयं जांच क्यों नहीं की और उसके बजाय जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को अधीनस्थ कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश क्यों दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट अश्विन इंगोले ने पैरवी की।




