
गोंदिया। रेल हादसे में अपना एक हाथ गंवाने वाले एक बेबस नागरिक के हक का पैसा दबाए बैठी ‘भारतीय स्टेट बैंक’ (SBI) को आखिरकार उपभोक्ता आयोग के आगे झुकना ही पड़ा। उपभोक्ता संरक्षण कानून की धारा 72 के तहत जारी गैर-जमानती वारंट (NBW) की तलवार लटकते ही 30 ऑक्टो.शुक्रवार को एसबीआई गोंदिया शाखा के मुख्य प्रबंधक अरविंद कुमार आयोग के कटघरे में हाजिर हुए। आदेश की अवहेना पर आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रबंधक को 15,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके (PR Bond) पर रिहा किया और मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 तय करते हुए ‘प्ली-रिकॉर्ड’ दर्ज करने व नियमित जमानत पेश करने का आदेश सुनाया है।
अदालती डंडे का असर यह हुआ कि बैंक प्रबंधन ने आज ही पीड़ित पवन तिवारी को 6,86,568 रुपये (छह लाख छियासी हजार पांच सौ अड़सठ रुपये) का डिमांड ड्राफ्ट/धनादेश आयोग के समक्ष सौंप दिया, जिसे पीड़ित ने स्वीकार कर लिया।
FD बनाई नहीं , करता रहा बैंक टालमटोल
गोंदिया के गणेश नगर इलाके के निवासी पवन श्रावण तिवारी 3 जनवरी 2015 को ट्रेन हादसे में अपना एक हाथ हमेशा के लिए खो बैठे थे। रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल (RCT), नागपुर ने 2017 में उन्हें 4.80 लाख रुपये का मुआवजा मंजूर किया था, जिसमें से 3 लाख रुपये की एफडी 5 साल के लिए बनाने का आदेश था। मध्य रेलवे ने जनवरी 2018 में ही 3 लाख रुपये का चेक SBI गोंदिया शाखा को भेज दिया था। लेकिन संवेदनहीनता की हद देखिए-बैंक ने यह एफडी बनाई ही नहीं! हद तो तब हो गई जब 2022 में बैंक ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि चेक भुनाए जाने का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।
आयोग के आदेश पर भी नहीं पसीजा बैंक प्रशासन
पीड़ित की शिकायत (क्र. 22/102) पर जिला उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग (अध्यक्ष वैशाली गजभिये, सदस्य अतुल आलसी और संजय जोशी) ने 16 जनवरी 2025 को बैंक व रेलवे को 45 दिनों के भीतर 2018 से ब्याज सहित एफडी बनाने, 25 हजार मानसिक संताप व 10 हजार कानूनी खर्च चुकाने का सख्त फैसला सुनाया था। बार-बार आवेदन देने के बावजूद बैंक टालमटोल करता रहा। जून 2025 में पीड़ित ने धारा 72 के तहत निष्पादन याचिका (EA 19/2025) लगाई।
उपभोक्ता आयोग में हाई वोल्टेज ड्रामा , खुला 8 साल का राज़
13 अगस्त 2026 को मध्य रेलवे ने SBI मुंबई मुख्य शाखा का पत्र पेश कर बैंक के झूठ का पर्दाफाश कर दिया कि चेक 2018 में ही क्लियर होकर गोंदिया शाखा के खाते में जमा हो चुका था। आदेश की खुली अवहेलना देख आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए शाखा प्रबंधक के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। वारंट की तामीली के डर से प्रबंधक शुक्रवार को अपने वकील के साथ आयोग में पेश हुए।
15000 के मुचलके पर रिहाई , नियमित जमानत देनी होगी
30 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान गैर अर्जदार प्रबंधक की ओर से एडवोकेट पराग तिवारी ने वकालतनामा और व्यक्तिगत मुचलका पेश किया, जिसे मंजूर करते हुए आयोग ने 15,000 रुपये के बॉन्ड पर रिहाई दी। साथ ही बैंक द्वारा पेश 6,86,568 रुपये का धनादेश पवन तिवारी को दिलवाया गया। आयोग ने स्पष्ट किया है कि प्रबंधक को 10 दिसंबर 2026 को अपनी नियमित जमानत देनी होगी और उसी दिन उनका बयान प्ली-रिकॉर्ड दर्ज किया जाएगा। उधर, पीड़ित पक्ष अब आरटीआई के जरिए यह पता लगाने में जुटा है कि 8 साल तक दिव्यांग का पैसा दबाने के पीछे आखिर कौन सा बैंक अधिकारी जिम्मेदार था।
पीड़ित दिव्यांग की ओर से जिला ग्राहक तक्रार निवारण अयोग में पैरवी एडवोकेट संदीप खाटेड तथा एडवोकेट अनिता दास ने की।
रवि आर्य




