Published On : Sun, Mar 17th, 2019

गोंदिया: हरित क्रांति के नाम पर किसानों से छलावा

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गोंदिया। धान का कटोरा कहे जाने वाले गोंदिया जिले के किसान मुख्यतः धान की खेती करते है। धान फसल को पकाने के लिए सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है लेकिन 40 साल बाद भी गोंदिया-भंडारा जिले के किसानों के खेतों तक पानी नहीं पहुंचा। आज भी यहां का किसान इंद्रदेव पर निर्भर है। अगर बारिश हुई तो फसल अच्छी, अगर बारिश नहीं हुई तो सूखे अकाल की समस्या बन जाती है।

कुल मिलाकर गोंदिया जिले के किसानों के किस्मत की डोर ऊपर वाले के हाथ है, कमोवेश इसी का नतीजा है कि वे वर्ष में दो फसल नहीं, एक फसल ही ले पाते है जिससे उनकी आमदनी आधी है नतीजतन पूर्व विदर्भ में सबसे अधिक किसान आत्महत्याओं की खबरें भी इसी नक्सल प्रभावित जिले से बाहर आती है।

पिछले 4 दशकों में न जाने कितनी सरकारें आयी और चली गई.. ना तो कभी कांग्रेस ने सूध ली और ना राष्ट्रवादी कांग्र्रेस ने तथा ना ही भाजपा ने? अब क्योंकि चुनाव का दौर शुरू हो गया है तो फिर यह अधुरे पड़े सिंचाई प्रकल्पों का मुद्दा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभर रहा है। प्रभावित इलाकों के कुछ ग्रामवासियों ने तो प्रचार के दौरान आने वाले नेताओं के गांवबंदी तक का निर्णय ले लिया है।

किसानों के आर्थिक पिछड़ेपन की वजह अधूरी परियोजनाएं

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उल्लेखनीय है कि, गोसीखुर्द परियोजना अटकी पड़ी है और बावनथड़ी नदी पर निर्मित अंर्तराज्यीय बावनथड़ी डैम जो बालाघाट जिले की कंटगी तहसील के ग्राम कुड़वा एंव महाराष्ट्र के भंडारा जिले की तुमसर तहसील यहां 31 मीटर ऊंचा और साढ़े 6 किमी लंबा बांध बनाया गया है, इसका लाभ भी सिंचाई हेतु किसानों को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। वहीं धापेवाड़ा उपसा सिंचन टप्पा-टू का पानी किसानों को नहीं, अदानी थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट को पहुंचाया जा रहा है तथा 15 वर्षों बाद भी वैनगंगा नदी पर बनने वाली रजेगांव-काटी लिफ्ट एरिगेशन योजना भी अब तक अधुरी है। वहीं निमगांव लघु परियोजना तथा चुलबंद लघु सिंचाई परियोजना के प्रति व्याप्त नेताओं की बेरूखी से किसानों का आर्थिक पिछड़ापन एक बड़ी वजह बन चुका है जिसे लेकर गोंदिया-भंडारा जिले के किसानों में खासा रोष व्याप्त है लिहाजा इस चुनाव में पक्ष हो या विपक्ष.. दोनों को ही किसानों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है।

इस चुनाव में सिंचाई की समस्या एक बड़ा मुद्दा बन चुका है जो 11 अप्रैल को होने वाले मतदान में बेहद निर्णायक साबित होगा।

गोसीखुर्द परियोजना का 35 साल का सच

नागपुर, भंडारा व चंद्रपुर जिले के लिए हरित क्रांति में मील का पत्थर साबित होने वाली गोसीखुर्द सिंचाई परियोजना भंडारा जिले की पवनी तहसील के वैनगंगा नदी पर बनाने को मंजूरी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1983 में नोटिफिकेशन जारी कर दी।

11.35 किमी लंबाई बांध की इस परियोजना पर राजीव गांधी सरकार के वक्त 372 करोड़ रूपये लागत थी। यह परियोजना 1990 में पूर्ण होनी थी, लेकिन 35 साल बाद भी अब तक यह परियोजना भंडारा जिले के 5 गांवों और नागपुर जिले के 10 गांवों के पुनवर्सन के पेच में फंसी पड़ी है।

सिंचाई शून्य, खर्च शिखर पर..

गोंसीखुर्द परियोजना हेतु भंडारा जिले के 104 गांव, नागपुर जिले के 85 तथा चंद्रपुर जिले के 11 गांवों के जमीन अधिगृहण, पुनवर्सन और बांध निर्माण पर वर्ष 2010 तक 11 हजार 500 करोड़ रू. खर्च किए गए। इस परियोजना के पूर्ण होने से इन 3 जिलों के 2 लाख 50 हजार 800 हेक्टर जमीन को सिंचाई का लाभ मिलना है। 15 हजार करोड़ रूपये से अधिक का खर्च और 90 प्रतिशत काम पूर्ण हो जाने के बाद महाराष्ट्र में 70 हजार करोड़ का सिंचाई घोटाला गूंज उठा। गोसीखुर्द परियोजना पर भी गतचुनाव में जमकर भ्रष्टाचार को लेकर सियासत हुई। अब 2019 के चुनाव का शंखनांद हो चुका है तो फिर एक बार गोसीखुर्द डैम को लेकर किसानों के सवाल नेताओं से शुरू हो चुके है कि, आखिरकार 35 वर्ष बाद भी उनके खेतों तक पानी क्यों नहीं पहुंचा?

… रवि आर्य

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