
नागपुर: दूसरों को समझना, उनको जानना- पहचानना, यह केवल मात्र जानकारी है। परंतु, स्वयं को समझना, अपनी आत्मा से परिचित होना, उसको जानना, उसको तृप्त करना, यह ज्ञान है। यही आत्मज्ञान जीवन की राह तलाशने में सहायक होता है। जीवन यात्रा को समझने में यही ज्ञान है जो प्रथम स्थान पर आता है। उक्त उद्गार अहमदाबाद- गुजरात से आए संतश्री स्वामी आत्मातृप्त जी ने रोटरी क्लब आॅफ नागपुर ईशान्य व नगर माहेश्वरी सभा के संयुक्त तत्वावधान में सुरेश भट्ट सभागृह, रेशमबाग में आयोजित ‘आईये समझें जीवन यात्रा को’ व्याख्यानमाला के अंतर्गत व्यक्त किए। व्याख्यानमाला के दौरान सभागृह में लगभग 1500 श्रोता उपस्थित थे।
इस अवसर पर प्रमुखता से डा. स्वामी प्रेम प्रकाशजी, रोटरी क्लब आॅफ नागपुर ईशान्य के अध्यक्ष रो. आनंद कालरा, सचिव रो. गौतम बैद, कमेटी चेयरपर्सन रो. नवीन लांजेवार, नगर माहेश्वरी सभा के अध्यक्ष पुरुषोत्तम मालू, सचिव राजेश काबरा, प्रोजेक्ट डाइरेक्टर संजय लोया, रोटरी के पूर्व अध्यक्ष नरेश जैन, प्रमोद जावधिया, महेश लाहोटी, सदस्य महेश सोनी, नवीन चांडक, अतुल भैया, नरेश बलदवा, संजय राठी, योगेश टावरी, परेश महंत, हर्षित अग्रवाल, दिनेश राठी, पीयूष फतेपुरिया, नीलेश खारा, इलेश खारा, यतीन खारा, जतीन सकलानी उपस्थित थे। स्वामी आत्मातृप्तजी स्वामी नारायण ‘बीएपीएस’ संगठन के संत हैं। कार्यक्रम का आगाज सभी प्रमुख अतिथियों ने दीप प्रज्वलन कर किया।
स्वामी जी ने उदाहरण समझाते हुए बताया कि शतकों वर्ष पूर्व परशिया देश के राजकुमार प्रिन्स झेमायर को बाल्यकाल से ही पता था कि वो राजा घोषित होंगे। उन्होंने सोचा राजा बनने से पूर्व विश्व की मानव जाति का इतिहास जान लंू, उसका अध्ययन कर लूं। इसके लिये उन्होंने बड़े बडे़ विद्वानों को लगाया। सारा जीवन बीत गया परंतु वे मानव जीवन का सार नहीं समझ पाए। अंत समय में एक विद्वान ने तीन वाक्यों में समझाया कि मनुष्य जन्म लेता, जीवन भर समस्याओं का सामना करता है और आखिर में वह मर जाता है। इस जीवन यात्रा को किस तरह निभाना है महत्वपूर्ण यह है।
उन्होंने कहा कि राजा हो या रंक, अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित समस्या हर किसी के जीवन में आती है। कोई स्वयं नहीं चाहता की कठिनाई, समस्या आए परंतु वह आती हंै। यह यात्रा संघर्ष की यात्रा है और इस संघर्ष यात्रा, इन परेशानियों व समस्याओं में भी जो सुख को ढंूढ लेता है वहीं अपनी जीवन यात्रा को सफल बनाता है। जीवन कभी शीतल छाया है तो कभी सूर्य की भांति गर्म। सर्वप्रथम मनुष्य यह स्वीकार करे कि जीवन यात्रा में परिस्थितियां बदलती रहेंगी। हमारा आत्मज्ञान हमें उन परिस्थितियों को सहन करने, हमें बलवान बनने में सहायक सिद्ध होता है।
हर कोई इस नशवर शरीर को महत्व देता है। परंतु आत्मा के सम्मुख इस शरीर का कोई मूल्य नहीं है। जीवन यात्रा की किसी भी समस्या को स्वीकार करना सीखें। इसका स्वीकार करने के लिये हमें जिस परिपक्वता की आवश्यकता होती है उसके लिये ज्ञान होना जरूरी है। यह अज्ञान ही है जो हमें दुखी करता है। हम सांसारिक पदार्थों, भौतिक सुखों की ओर बढ़ते चले जाते हैं। परंतु सुलभ ज्ञान है जो इस जीवन के मर्म को समझाता है उसे ही नहीं समझ पाते। इस संसार में ऐसी कोई परिस्थिति नहीं, ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो हमें दुखी कर सके जब तक हम स्वयं दुखी न होना चाहें। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन रो. नितिन ठक्कर ने किया।
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