Published On : Thu, Nov 14th, 2019

कूटनीति : भाजपा की सरकार अन्यथा राष्ट्रपति शासन

– भाजपा की स्वार्थी कदम से राष्ट्रपति व राज्यपाल पद ‘डमी’ साबित हुआ ?

नागपुर : महाराष्ट्र में ३ सप्ताह पूर्व विधानसभा चुनाव हुए,जिसमें किसी भी पक्ष को सरकार बनाने के लिए पूर्ण बहुमत नहीं मिला।ऐसी सूरत में सरकार बनाने के लिए ललायित भाजपा ने काफी हाथ-पांव मारे लेकिन असफल रही तो नियमों की खानापूर्ति कर राष्ट्रपति शासन लगवा दी.ऐसा आरोप सेना,एनसीपी व कांग्रेस द्वारा लगाया जा रहा हैं.

राज्य में ३ सप्ताह पूर्व हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के १०५,शिवसेना के (56), कांग्रेस (44) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (54)। बहुजन विकास आघाडी ने 3 सीटें जीतीं। अखिल भारतीय मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन, प्रहार जनशक्ति पार्टी और समाजवादी पार्टी ने 2 सीटें जीतीं। राज्य भर में 13 निर्दलीय उम्मीदवारों में से कई को विजयी घोषित किया गया। स्वाभिमानी पक्ष, राष्ट्रीय समाज पक्ष, किसान और श्रमिक पार्टी ऑफ इंडिया, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, क्रांतिकारी शेतकरी पार्टी, जन सुराज शक्ति और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने १-१ सीटों पर जीत दर्ज की.

इसके तुरंत बाद भाजपा ने युति के दूसरे बड़े दल शिवसेना के संग सरकार बनाने के लिए पहल शुरू की लेकिन शिवसेना सत्ता में भागीदारी बराबरी के जिद्द पर अड़ गई,चूंकि वर्ष १९९५ में शिवसेना ने भाजपा को कम सीटों के बाद भी बराबरी का दर्जा सह हिस्सा दिया था.

शिवसेना के अड़ने से भाजपा अस्वस्थ्य हो गई.सोची समझी रणनीति के तहत राज्यपाल के सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सरकार बनाने के न्यौते के बाद भी सेना अपने शब्दों पर कायम रही.राज्यपाल ने भाजपा को ४८ घंटे से अधिक का वक़्त दिया था लेकिन उन्होंने १४५ के जादुई आंकड़ा न होने के कारण सरकार बनाने के दावे को अस्वीकार कर दिया।

फिर राज्यपाल ने दूसरी सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना को सरकार बनाने का न्यौता दिया लेकिन समय सिर्फ २४ घंटे के दिए जाने से वे भी कुछ कर नहीं पाए.क्षुब्ध शिवसेना सर्वोत्तम न्यायालय की शरण में चली गई थी लेकिन सरकार बनाने के लिए उलटे पांव लौट आई.इसके बाद राज्यपाल ने तीसरी सबसे बड़ी दल एनसीपी को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया लेकिन साथ ही में उन्होंने राष्ट्रपति शासन के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल केबिनेट को भी सिफारिश कर दी.एनसीपी के हाँ-ना के मध्य आनन-फानन में केंद्रीय मंत्रिमंडल कैबिनेट की बैठक भी हो गई,उनकी मंजूरी भी मिल गई और राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए स्वीकृति भी दे दी गई और तो और राष्ट्रपति ने भी अपने पद की गरिमा को दरकिनार कर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन कल शाम से लगा दिया।

अर्थात केंद्र में जिसकी सत्ता उसी दल का ‘डमी’ राष्ट्रपति व राज्यों में राज्यपाल होते हैं,ऐसा आरोप विपक्षी सभी दल लगा रहे.इस आरोप से राष्ट्रपति व राज्यपाल के अस्तित्व पर कई सवाल खड़े हो गए,जो कि गर्मागर्म चर्चा का विषय बना हुआ हैं.

महाराष्ट्र राज्य का गठन १ मई १९६० में हुआ था.अब तक तीसरी बार राष्ट्रपति शासन महाराष्ट्र में लगाया गया.पहली दफा तात्कालिन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी की सरकार ने शरद पवार के नेतृत्व वाली प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार को बर्खास्त करने के बाद १९८० में राष्ट्रपति शासन लगाया था,इसके बाद फरवरी २०१४ में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया था.राज्य के ५९ वर्ष के इतिहास में ३ बार महाराष्ट्र राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया.

वहीं कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष नितिन राऊत ने कहा कि राष्ट्रपति शासन लगाने के लिये सुको द्वारा निश्चित दिशा निर्देश को दरकिनार कर महाराष्ट्र में गलत तरिके से राष्ट्रपति शासन लगाकर लोकतंत्र एवं संविधान का मजा़क उडाने का काम भाजपा प्रणित केंद्र सरकार एवं राज्यपाल ने किया। महाराष्ट्र के राज्यपाल ने भाजपा के ‘एजंट’ के रुप में कार्य किया,राज्य में सरकार बने इसलिए अंतिम अवसर तक समय देखने/मौका देने के बजाय अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा को मदद करने का काम किया,राज्यपाल के इस कदम का राऊत ने कडा़ निषेध किया हैं.

बावजूद इसके अब भी कोई दल या कुछ दल १४५ अर्थात बहुमत का जादुई आंकड़ा राज्यपाल को सबूत सह पेश करती हैं तो सरकार बनाने का उन्हें राज्यपाल अवसर प्रदान कर सकते हैं.