Published On : Sat, Dec 9th, 2017

‘नीच राजनीति’ की ‘हत्या’ होना जरूरी

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Neech
इस कलयुगी जमाने में जहां किसी ‘नीच’ को भी नीच कहना घोर पाप है, गुनाह है,… वहां देश के शिखर पद पर विराजी हस्ती को अपनी गंदी जुबान से एक मगरूर नेता ने ‘नीच और असभ्य आदमी’ कहकर कोसा, तो बवाल मच गया. उसकी पार्टी ने आनन-फानन उसे दूध में गिरी हुई मक्खी की तरह निकाल फेंका, तो इनकी पार्टी ने भी सारी हदें पार कर दीं! ‘नीच’ शब्द के कारण एक ‘मणि’… ‘कंकर’ हो गया, फिर भी उस पर ‘नीच बहस’ जारी है. अब इस नीच सोच, नीच मानसिकता, नीच प्रवृत्ति और ‘नीच राजनीति’ का क्या करें? या तो इसकी अनदेखी करें, या फिर इसका खात्मा करें!…. अथवा इसको उच्च दर्जे का बनाने का प्रयास करें, लेकिन इसके लिए सभी पक्षों में घुसे-बैठे ‘नीच सफेदपोशों’ को बाहर निकालना होगा. क्या ‘कीचड़ में कमल’ खिलाने वाले और ‘घायल पंजा’ लहराने वाले लोग, अपने ऐसे ‘नीच साथियों’ को बाहर निकालने का दम-खम दिखाएंगे? जो किसी को रावण, भस्मासुर, मुगल, हरामजादे, शहजादे, बार बाला, पागल, गधा और नालायक जैसे उलजलूल विशेषणों से अलंकृत करते आ रहे हैं!

वर्षों से भारत की राजनीति में ‘नीच प्रवृत्ति’ के कई सफेदपोश बड़ी-बड़ी कुर्सियों को गंदा और मैला-कुचैला करते रहे हैं. इनकी नीचता कई बार घपलों-घोटालों, रिश्वतखोरी, संसद में सवाल पूछने के लिए पैसा लेने, रक्षा सौदों में दलाली खाने से लेकर बोफोर्स-राफेल, चारा, टूजी, सीडब्ल्यूजी, व्यापम आदि मामलों में देश देख चुका है. लेकिन अफसोस यह कि किसी भी ‘नीच’ का आज तक कुछ नहीं बिगड़ा! दरअसल, ‘नीच’ का कुछ बिगड़ता ही नहीं! बिगड़ता है, तो आप-हम जैसे साफ-सुथरे मतदाताओं का, जो इन जैसे ‘नीच लोगों’ को लोकतंत्र के उच्च आदर्शों के नाम पर चुन कर देते हैं! ….और फिर यही लोग कभी मंदिर-मस्जिद, कभी हिंदू-मुस्लिम, कभी आरक्षण, कभी तुष्टीकरण, तो कभी भगवा-हरा आतंकवाद के चक्रव्यूह में हमें उलझा देते हैं! क्या इनसे बचने और देश को बचाने की जरूरत नहीं है?

वैसे धर्म के नाम पर जनभावनाओं से खेलना इस देश के लिए नया नहीं है. 25 साल पहले 6 दिसंबर का वह ‘काला दिन’ भला कौन भूल सकता है! कुछ आस्थावान ‘भक्त लोग’ इसे ‘शौर्य दिवस’ कहकर मनाते हैं. मगर सच तो यही है कि देश ने उस रोज विनाश की ऐसी विभीषिका देखी, जिसके घाव आज भी हरे और गहरे हैं! पीड़ा यथावत है! कड़वा सच भी यही है कि इसी ‘विध्वंस कांड’ के बाद भारत में ‘नीच राजनीति’ का प्रवेश हुआ. उसी दिन से सांप्रदायिकता की आग में देश आज तक झुलस रहा है, लेकिन सभी दलों के ‘ऊंचे-नीचे’ लोगों ने इस मसले को आज तक लटकाए रखा है. एक पार्टी के वकील साहब तो इसके जमीन विवाद की सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तक टलवाना चाहते हैं. आखिर कब तक ये लोग इस मुद्दे को यूं ही लटकाना और भारत को भटकाना चाहते हैं? क्या यह ‘राजनीतिक नीचता’ नहीं?

इधर राजस्थान के राजसमंद में एक ‘अतिनीच’ ने एक बुजुर्ग को दिनदहाड़े मार-काट डाला! फिर उसे जला दिया! और तो और, उसका वीडियो भी बना कर खुद ही उसे वायरल कर दिया! मरने वाला मुसलमान था, और मारने वाला हिंदू के नाम पर कलंक! दरअसल, टीआरपी बढ़ाने वाली टीवी और ‘नीच राजनीति’ मिलकर जो जहर समाज में बो रही है, उसी का पेड़ है ये! यह उसी ‘नीच कर्म का नीच फल’ है, जो ‘अंध भक्तों’ को सांप्रदायिकता के ‘मानव बम’ में बदल रहा है. ऐसे नीच कर्मों को रोकने के लिए ‘अच्छे कर्म’ करने का दावा करने वाला कोई शख्स आगे क्यों नहीं आता? आखिर कब तक देश में असुरक्षा का भाव बना रहेगा? कब तक अखलाक और सैयद मारे जाते रहेंगे? कोई केरल का उदाहरण देगा, तो कोई यूपी-राजस्थान का, लेकिन हमारा दावा है कि यह सब ‘नीच प्रवृत्ति वाली नीच राजनीति’ के जहरीले दंश के कारण ही हो रहा है! आज भी वक्त है, अगर हमें ऐसी नीच वृत्ति और प्रवृत्ति से देश को बचाना है, तो इसके लिए जिम्मेदार ‘नीच राजनीति’ का खात्मा करना जरूरी है. उसी की हत्या करना ही अंतिम विकल्प है. क्या समाज तैयार है इसकी ‘हत्या’ करने के लिए?

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