नागपुर: जुनी शुक्रवारी, रेशमबाग स्थित प्लॉट नंबर 54 को अवैध बताते हुए नागपुर महानगरपालिका ने हाई कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए विजय डांगरे की संपत्ति को सील कर दिया था। बाद में सील टूटने के बाद उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराएं 426, 447 और 448 के तहत मामला दर्ज किया गया। हालांकि, जिला न्यायालय में सुनवाई के दौरान मनपा के ही तत्कालीन सहायक आयुक्त ने कबूल किया कि हाई कोर्ट से ऐसी कोई सीलिंग की अनुमति नहीं मिली थी। इस स्वीकारोक्ति के बाद कोर्ट ने डांगरे को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
इस पूरे मामले की शिकायत हनुमाननगर जोन के शाखा अभियंता देवजी चिंतनवार ने दर्ज कराई थी। उन्होंने दावा किया था कि 18 मार्च 2014 को हाई कोर्ट के आदेश के तहत 21 मार्च को डांगरे की संपत्ति सील की गई थी। लेकिन 2 जुलाई को सील टूटी हुई मिली, जिसके बाद एफआईआर दर्ज की गई।
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कोर्ट में खुलासे
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने कहा कि उनके सहायक संजय पडोले और अशोक साठवने ने इमारत की नापजोख की थी। यह भी बताया गया कि इमारत अवैध थी और सहायक आयुक्त विजय हुमने के निर्देश पर सील की गई। लेकिन बचाव पक्ष की जिरह के दौरान शिकायतकर्ता ने न तो नापजोख की पुष्टि की और न ही यह बताया कि इमारत किसकी थी या वहां कौन-सा कार्यालय था।
सहायक आयुक्त का बयान
गवाही के दौरान सहायक आयुक्त विजय हुमने ने माना कि न तो इमारत का मालिकाना दस्तावेज दाखिल किया गया और न ही हाई कोर्ट ने उस इमारत को सील करने का कोई आदेश दिया था। उन्होंने यह भी माना कि न उन्होंने इमारत को सील किया और न ही उस पर कोई सील लगी थी जिसे तोड़ा गया हो। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी की दैनिक गतिविधियों पर उन्होंने कोई निगरानी नहीं रखी थी और आरोपी को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जानते हैं।
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नतीजा
अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में विरोधाभास और दस्तावेजों की कमी के चलते कोर्ट ने विजय डांगरे को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। इस फैसले ने मनपा की कार्रवाई और प्रमाणों की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।