नागपुर। चांदी के दामों में बीते कुछ महीनों से चल रही बेकाबू उछाल और अचानक आई तेज़ गिरावट ने नागपुर के व्यापारिक जगत को हिलाकर रख दिया है। पहली नज़र में यह उतार-चढ़ाव सामान्य बाज़ार गतिविधि जैसा लग सकता है, लेकिन गहराई में जाएं तो तस्वीर कहीं ज़्यादा डरावनी है। चांदी के भावों की इस असामान्य चाल के पीछे डब्बा ट्रेडिंग और अवैध सट्टा नेटवर्क की भूमिका सामने आ रही है, जिसने नागपुर को इस काले खेल का बड़ा केंद्र बना दिया है।
इस सट्टेबाज़ी के खेल में छोटे व्यापारियों से लेकर नामचीन कारोबारी तक करोड़ों रुपये गंवा चुके हैं। पूर्व नागपुर में एक प्रसिद्ध मिठाई-रेस्टोरेंट संचालक द्वारा लगभग 26 करोड़ रुपये गंवाने और अपनी मेन रोड स्थित दुकान-बिल्डिंग तक खो देने का मामला इस तबाही की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है। इटवारी, शंकरनगर और जरीपटका जैसे व्यापारिक इलाकों में भी चांदी के सौदों से जुड़े भारी नुकसान की चर्चाएं आम हो चुकी हैं।
चांदी के भावों में रोज़ाना हजारों रुपये की उछाल-पछाड़ ने इसके कारोबार को पूरी तरह सट्टे का रूप दे दिया है। पुरानी दरों पर ऑर्डर लेने वाले सराफा कारोबारी नई कीमतों की आग में झुलस गए हैं। हालात यह हैं कि यह संकट अब सिर्फ़ व्यापारिक नुकसान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर की आर्थिक और सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करने लगा है।
क्या यह बाज़ार की सामान्य चाल है या संगठित सट्टा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि चांदी में आई यह असामान्य तेजी और गिरावट क्या बाज़ार की स्वाभाविक प्रक्रिया है, या फिर इसके पीछे संगठित डब्बा नेटवर्क का हाथ है। पूर्व नागपुर में जिस तरह डब्बा कारोबार से जुड़े खिलाड़ी एक-एक कर डूबते गए, उसने इस शक को और गहरा कर दिया है।
एक ओर जहां कुछ लोग ‘इज़ी मनी’ के लालच में बिना स्टॉक के चांदी के सौदे करते रहे, वहीं दूसरी ओर डब्बा ऑपरेटरों ने अपने नेटवर्क के ज़रिये भावों को मनचाहे तरीके से मोड़ने की कोशिश की। नतीजा यह हुआ कि कई व्यापारी संभलने का मौका मिलने से पहले ही पूरी तरह टूट गए।
नागपुर से संचालित हो रहा है डब्बा नेटवर्क
औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र माने जाने वाले नागपुर की पहचान अब धीरे-धीरे अवैध सट्टा और डब्बा ट्रेडिंग के बड़े केंद्र के रूप में बनती जा रही है। यहीं से विदर्भ के विभिन्न शहरों के साथ-साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना तक यह नेटवर्क फैला हुआ बताया जा रहा है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, कई बड़े बुकी और डब्बा ऑपरेटर विदेशों में बैठकर मोबाइल ऐप, एन्क्रिप्टेड चैट और फर्जी आईडी के ज़रिये करोड़ों रुपये का खेल संचालित कर रहे हैं। यह पूरा सिस्टम इतना पेशेवर तरीके से चलता है कि आम निवेशक को यह गतिविधि पहली नज़र में वैध कारोबार जैसी लगती है।
चांदी के उतार-चढ़ाव से सराफा कारोबार पर मार
बीते 5–6 महीनों में चांदी के दामों में आई अस्थिरता ने सराफा कारोबार की नींव हिला दी है। नागपुर में दिनभर दुकान पर बैठकर MCX के भाव देखने वाले कई व्यापारी ‘डब्बा रेट’ के भरोसे बैठे रहे और अचानक आए पलटाव में अपनी जमा-पूंजी गंवा बैठे।
सूत्र बताते हैं कि क्रिकेट सट्टा और डब्बा कारोबार (अवैध शेयर, गोल्ड और सिल्वर ट्रेडिंग) के इस खेल ने व्यापारियों, युवाओं और उद्योगपतियों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। बदनामी के डर से कई लोग प्रशासन के पास जाने से भी कतराते रहे।
26 करोड़ की हार और संपत्ति पर कब्ज़ा
पूर्व नागपुर के जिस नामचीन मिठाई-रेस्टोरेंट संचालक की चर्चा शहर में है, उसने बीते छह महीनों में अपनी जीवनभर की कमाई, प्रॉपर्टी और कारोबार सब कुछ दांव पर लगाकर गंवा दिया। बताया जाता है कि लगभग 26 करोड़ रुपये की हार के बाद उसकी मेन रोड स्थित बड़ी बिल्डिंग भी हाथ से निकल गई।
सूत्रों के अनुसार, आर्थिक मदद देने वाले करीबी रिश्तेदार ने उसकी संपत्ति अपने नियंत्रण में ले ली और अब वही बिल्डिंग उसे 5 लाख रुपये महीने के किराए पर दी जा रही है। यह मामला डब्बा कारोबार में फंसने वालों के लिए एक कड़वी चेतावनी बन गया है।
अन्य कारोबारी भी नहीं बचे
- इटवारी और शंकरनगर क्षेत्र में शोरूम संचालित करने वाले एक बड़े ज्वेलरी कारोबारी ने करीब 11 करोड़ रुपये चांदी के सौदों में गंवाए।
- पूर्व नागपुर का एक 32 वर्षीय व्यापारी, जिसे अपने डब्बा आका का बेहद करीबी बताया जाता है, करोड़ों के नुकसान के बाद कारोबार से लगभग बाहर हो चुका है।
- जरीपटका निवासी एक नामचीन साड़ी व्यापारी के पुत्र ने चांदी के इस खेल में लगभग 9 करोड़ रुपये गंवा दिए।
जो चांदी कुछ महीनों पहले 1 लाख रुपये से बढ़कर 4 लाख 20 हजार रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी, वही चांदी फरवरी के मध्य तक गिरकर करीब 2 लाख 39 हजार रुपये प्रति किलो पर आ गई।
‘इज़ी मनी’ का लालच और प्रशासन की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि डब्बा ट्रेडिंग का सबसे बड़ा हथियार ‘इज़ी मनी’ का लालच है। छोटा मुनाफ़ा लोगों को बड़े जोखिम की ओर धकेल देता है और घाटे की भरपाई की ज़िद उन्हें और गहरे दलदल में फंसा देती है।
अब सवाल प्रशासन के सामने भी है—
क्या तकनीकी निगरानी और आर्थिक खुफिया तंत्र इतने कमजोर हैं कि करोड़ों का अवैध सट्टा खुलेआम चलता रहे?
या फिर इस काले धंधे की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है?
नागपुर में सामने आया यह मामला साफ़ संकेत देता है कि चांदी का सट्टा अब सिर्फ़ बाज़ार का जोखिम नहीं, बल्कि व्यापार, परिवार और सामाजिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। ‘इज़ी मनी’ के इस काले सच को समझना और उससे दूर रहना ही इस तबाही से बचने का एकमात्र रास्ता है।








