Published On : Mon, Nov 26th, 2018

खतरे में संविधान!

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भारत आज संविधान दिवस मना रहा है ।

उस ‘भारतीय संविधान ‘,जिसे हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सर्वाधिक पवित्र धार्मिक ग्रंथ निरुपित कर चुके हैं,के अस्तित्व में आने का दिवस!वह संविधान, जो हमें समानता के अधिकार के साथ अजादी का एहसास दिलाता है ।वह संविधान, जो गौरवशाली भारत के धर्म निरपेक्ष चरित्र को मोटी लकीरों से चिन्हित करता है ।वह संविधान,जो विधायिका ,कार्यपालिका और न्यायपालिका रुपी मजबूत पायों को लोकतंत्र के रक्षार्थ खड़ा करता है ।वह संविधान,जो लोकतांत्रिक भारत की अक्षुणता को सुनिश्चित करता है ।वह संविधान,जो जनता का,जनता के लिए,जनता के द्वारा समर्पित है ।

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तो फिर आज संविधान को खतरे में क्यों बताया जा रहा है?किससे खतरा है संविधान को?

ये प्रश्न उठ रहे हैं,तो जवाब तो चाहिए ही!स्थिति असहज है,लेकिन प्रश्न काल्पनिक नहीं ।आधार सामने हैं ।स्वयं सत्तापक्ष के अनेक नेता समय-समय पर संविधान बदलने,संविधान तोड़ने की बातें करते रहे हैं ।हाल के दिनों में संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के अनेक दृष्टांत प्रकट हुए हैं ।इन संस्थाओं में अवैध सरकारी हस्तक्षेप की बातें अब आम हैं ।कार्यपालिका की तो बातें ही व्यर्थ होंगी।इनमें पक्षपात पूर्ण सरकारी हस्तक्षेप की पुष्टि तो कोई दृष्टिहीन भी कर देगा ।निर्वाचन आयोग,सतर्कता आयोग की लुप्तप्राय विश्वसनीयता भी सरकारी हस्तक्षेप/प्रभाव की चुगली करती मिलेंगीं ।
इनसे इतर सर्वाधिक खतरनाक है न्यायपालिका पर कब्ज़े या इसके अवमूल्यन के प्रयास !पिछ्ले दिनों ऐसी प्रवृत्ति में वृद्धि स्पष्टतः दृष्टिगोचर हैं ।

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सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को खुली चुनौतियां मिल रही हैं ।आस्था की आड़ ले राजदल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ गोलबंद हो गये हैं ।केरल की राज्य सरकार आदेश को लागू कर पाने में लाचार दिख रही है ।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मामला तो और भी गंभीर है ।वर्षों से विवादित स्थल की मिलकियत को लेकर लंबित मामले में सन 2010में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आदेश देते हुए जमीन को तीन भागों में बाँट दिया था।आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई ।तुरंत सुनवाई की मांग पर सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस टिप्पणी के साथ कि हमारी “प्राथमिकताएं”और भी हैं,सुनवाई के लिए जनवरी 2019तक के लिये टाल दिया,तो न्यायालय की मंशा पर ही शक प्रकट किए जाने लगे।यहाँ तक कि धर्म के नाम पर भीड़ इकट्ठा कर सर्वोच्च न्यायालय को खुली चुनौती दे दी गई।

इसमें सर्वाधिक दुखद,शर्मनाक व खतरनाक पहलू ये कि इस ‘भीड़ ‘को सत्तापक्ष का खुला समर्थन मिलता दिख रहा है ।सर्वोच्च न्यायालय को “प्राथमिकता “के नाम पर सार्वजनिक रुप में आड़े हाथों लिया जा रहा है ।न्यायधीशों की मंशा पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं ।लोकतंत्र के लिए ये स्थिति भयावह है ।तुरंत विराम लगे ऐसी प्रवृत्ति पर ।

अन्यथा,कालांतर में ‘संविधान दिवस ‘कहीं राष्ट्रीय ‘शोक दिवस’के रुप में ना परिवर्तित हो जाए!क्योंकि,खतरे में तब संविधान का अस्तित्व होगा!!

और,अब तो भारत के मुख्य न्यायाधीश ने भी संविधान दिवस के दिन आज चेतावनी दे दी है कि अगर हम संविधान के तहत नहीं चलेंगे,तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम!

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