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    Published On : Mon, Oct 15th, 2018

    नीति आयोग के आधारभूत ढाँचे में हो बदलाव – भारतीय मजदुर संघ

    बीएमसएस अध्यक्ष सी के साजी नारायण ने देश में लागू आर्थिक नीति पर श्वेतपत्र लाने की सरकार से की माँग

    नागपुर: एक ओर सरकार देश के विकास से जुडी सारी नीतियाँ नीति आयोग के माध्यम से बना रही है। तो वही दूसरी तरफ संघ के जुड़े संगठन भारतीय मजदुर संघ के आयोग की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े किये है। बीएसमएस ने आयोग के काम की आलोचना करते हुए इसके आधारभूत ढाँचे को बदलने की माँग की है। बीएमएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सी के साजी नारायण के मुताबिक निति आयोग में बैठे लोग अपने विवेक से स्थितियों का अवलोकन कर नीतियाँ बनाते है। जिसका जमीनी हकीकत से कोई सरोकार नहीं बनता। आयोग की पॉलिसी मेकिंग मैकेनिजम को चेंज करने की आवश्यकता है। उन्होंने उदहारण देते हुए बताय कि आयोग किसानों से कर वसूलने,पैसे से पानी देने जैसे बेतुके सुझाव देता है।

    मजदूरों से जुडी नीति का निर्माण यही लोग कर रहे है। जबकि यह देश में लागू श्रम कानून का ही उल्लंघन करने जैसा है। जिस क्षेत्र के लिए योजना विकसित की जा रही है या नीति बनाई जा रही है। उसमे उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व रखना चाहिए। जिससे की प्रभावी नीति अमल में लायी जा सके। देश में आर्थिक सुधार के साथ ही श्रम सुधार के चलते भारी नुकसान हुआ है। सूक्ष्म और लघु उद्योग क्षेत्र पर तो असर सबसे अधिक हुआ है।

    जो नीतिया वर्त्तमान में है वो कुछ संपन्न लोगो को ही फ़ायदा पहुँचा रहे है। आर्थिक वर्ष 2013-14 में मैन्युफेक्चर सेक्टर निचले स्तर पर रहा। इसी तरह आर्थिक वर्ष 2014-15 में विदेशी निवेश बीते 50 वर्षो में सबसे कम रहा। देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति ठीक ढंग से लागू नहीं हो रही है। निजीकरण के कारण टेक्सटाईल इंड्रस्टी को सबसे अधिक 90% नुकसान हुआ है। नारायण का कहना है कि लेबर रिफार्म के तहत मौजूदा सरकार ने कई प्रभावी कदम भी उठाये है। जिसका फायदा श्रम क्षेत्र को हो रहा है।

    उदारीकरण की आर्थिक नीति पर लाया जाये श्वेत पत्र
    बीएमसएस के अध्यक्ष ने माँग उठाई की वर्ष 1991 से देश में लागू निजीकरण की आर्थिक नीति के बाद अब तक क्या काम हुआ इस पर सरकार द्वारा एक श्वेत पत्र लाया जाये। उनका कहना है कि उदारीकरण की नीति की वजह से देश को भारी नुकसान हुआ है। 26 वर्ष हो गए इसका क्या प्रभाव देश में हुआ इस पर सार्वजनिक तौर पर बहस होनी चाहिए। लिबरलाइजेशन,प्राईवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन का अध्ययन कर हमें देश में नई आर्थिक नीति बनाने की आवश्यकता है। यह नीति देश की आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनायीं जानी चाहिए। सरकार किसी की भी हो सबकी आर्थिक नीति सामान ही रही है जिसमे पूंजीवाद का प्रभाव रहा है।

    बैंको के मर्जर को लेकर नीति स्पस्ट नहीं
    आर्थिक सुधार के तहत देश में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंको का विलीनीकरण हो रहा है। बीएसएस ने माँग कि है की मर्जर को लेकर एक नीति बनाई जाये। नारायण ने इस फ़ैसले के बाद सामने आये उदाहरणों का हवाला देते हुए कहाँ कि बैंको के मर्जर की वजह से बड़ी बैंक के कर्मचारियों के हितों की रक्षा इस फैसले के बाद भी हो रही है लेकिन जो बैंक बड़ी बैंको में समाहित हो रहे है उनके कर्मचारी द्वितीय श्रेणी में आ जा रहे है। यानि उन पर अधिक काम का बोझ बढ़ रहा है। तबादले के लिए दबाव बनाया जा रहा है। देश की बैंकिंग प्रणाली विश्व के लिए उदहारण है लेकिन हाल के दिनों में सामने आये घोटाले छवि धूमिल कर रहे है।

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