
भंडारा। एक तरफ घर के आंगन में पिता का पार्थिव शांत पड़ा था… मातम की चादर बिछी थी… रिश्तेदारों के सिसकियों से माहौल भारी था… और दूसरी तरफ जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान-बारहवीं बोर्ड परीक्षा!दिल दहला देने वाले इस पल में एक बेटी ने अपने आंसुओं को थाम लिया… दिल पर पत्थर रख लिया… और हाथ में कलम उठाकर अंग्रेजी का पेपर छुड़ाने परीक्षा केंद्र में बैठ गई।
जी हां जान्हवी हौसीलाल रहांगडाले , एक ऐसी बेटी जिसकी कहानी हर किसी की आंखें नम कर देगी… लेकिन सीना गर्व से चौड़ा भी कर देगी।
पिता , घर लौटते वक्त गिरे , नहीं बची जान
भंडारा जिले के तुमसर तहसील के आंबागढ़ गांव की रहने वाली जान्हवी के 51 वर्षीय पिता हौसीलाल राहांगडाले सोमवार दोपहर साइकिल से घर लौट रहे थे , अचानक उनका संतुलन बिगड़ा और वे गिर पड़े। सिर में गंभीर चोट आई… और कुछ ही देर में उनका दुखद निधन हो गया। एक ही पल में परिवार की छत चली गई… घर का सहारा टूट गया… खुशियों का आकाश बिखर गया लेकिन नियति का इम्तिहान यहीं खत्म नहीं हुआ। अगले ही दिन- मंगलवार, 10 फरवरी को बारहवीं बोर्ड परीक्षा का पहला पेपर था… विषय था अंग्रेजी।
मातम के घर से परीक्षा हॉल तक , भविष्य लिख डाला
जान्हवी, जो भंडारा जिले के तुमसर स्थित जनता विद्यालय एवं कनिष्ठ महाविद्यालय की छात्रा है, जिंदगी के टर्निंग पॉइंट पर खड़ी थी। पिता का साया सिर से उठ चुका था… लेकिन पिता का सपना अभी जिंदा था।
सुबह करीब 10 बजे, वह अपने मामा के बेटे के साथ परीक्षा केंद्र पहुंची।
आंखों में आंसुओं के बादल थे… दिल में पिता की यादों का सैलाब…लेकिन उस बेटी ने हार नहीं मानी , पिता के सपनों को अपनी ताकत बनाया…आंसुओं को रोका…और परीक्षा कक्ष में बैठकर अंग्रेजी का पेपर पूरा किया।
हौसले अगर जिंदा हों तो सपने नहीं मरते
यह सिर्फ एक परीक्षा नहीं थी…
यह एक बेटी की हिम्मत, जिम्मेदारी और पिता के सपनों के प्रति समर्पण की मिसाल थी।
जान्हवी रहांगडाले ने साबित कर दिया- परिस्थितियां चाहे जितनी कठोर हों, हौसला अगर जिंदा हों तो सपने नहीं मरते।
रवि आर्य








