नागपुर: आज इस लेख की शुरुआत एक छोटी सी कहानी से करते है, एक बच्चा अपने स्कूल से घर जा रहा था। उसकी माँ उसे बस पड़ाव पर लेने पहुँची। वहीं एक चॉकलेट की दुकान थी, बच्चा ज़िद करने लगा उसे दुकान की सारी चॉकलेट चाहिए, पर उसकी माँ ने उसकी एक ना सुनी और उसपर दया कर एक चॉकलेट दिला दी। इस सबके बावजूद वह पूरे रास्ते वापस जाकर चॉकलेट लेने के ज़िद पर आड़ा रहा; जब वह घर पहुँचा तब उसके पिता ने उसे ज़ोर की फटकार लगाई और कहा की अगर वह अपनी ज़िद छोड़ कर शांत ना हुआ तो उसके पास जो है वह भी वापस ले लेंगे। बच्चे को बात की गहराई समझ आ गयी और उसने ज़िद छोड़ दिया! अब इससे ज़्यादा कुछ भी कहने की शायद यहाँ ज़रूरत नहीं होगी, आप समझ ही गए होंगे की हम यहाँ चर्चा किस विषय पर करने वाले है।
आपका ध्यान एक जटिल, अशक्त और अशांत भूगोल पर आकर्षित करते है। बलूचिस्तान की सीमाएं और इसका असर तीन देशों ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक है। इस हिस्से पर कभी हिंदु राजाओं का और अफगानिस्तान के दक्षिण में स्थित जाबुल में बसे बौद्ध राजाओं का शासन था। 850 ईसवीं सदी में नॉर्दन ईरान से यहां पर मुसलमानों का आगमन हुआ।युद्ध में मुसलमानों ने हिंदु राजाओं को हरा दिया और जो बचे थे वे पेशावर की ओर चले गए। 11वीं सदी में अफगानिस्तान में बचा हुआ हिंदुओं का साम्राज्य भी खत्म हो गया। वर्तमान में जो बलूचिस्तान है उसके हिस्से पर भारत का अधिकार था और दूसरे हिस्से पर कालात के खान राज करते थे।
भारत और पाक के बंटवारे के समय खानात ने जिन्ना को अपने वकील के तौर पर नियुक्त किया। कहते हैं कि जिन्ना ने ब्रिटिश सरकार के सामने खान के केस को पेश करते समय सोने के सिक्के फीस के तौर पर लिए थे। 11 अगस्त 1947 को इस हिस्से में कालात का साम्राज्य कायम हो गया। भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद भारत और पाक के अलावा स्वतंत्र कालात भी अस्तित्व में आया।
22 अक्टूबर 1947 को पाक ने जम्मू कश्मीर में घुसपैठ की और वह असफल रहा। जम्मू कश्मीर में मुंह की खाने के बाद पाक बलूचिस्तान को पाक में मिलाने की कोशिशें करने लगा। बलूचिस्तान में नई विधानसभा बनी और विधायिका ने कहा कि बलूचिस्तान को पाक में नहीं मिलाया जाएगा। 11 अप्रैल 1948 को कालात को जबरदस्ती पाकिस्तान में मिला लिया गया। इसी समय खान के छोटे भाई ने विद्रोह कर दिया और समर्थकों के साथ अफगानिस्तान चले गए। यहां से उन्होंने पाक के गैर-कानूनी कब्जे के खिलाफ एक जंग छेड़ दी।
वर्ष 1948 से लेकर आज तक वही जंग जारी है। यह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम पाकिस्तान, ईरान के दक्षिण-पूर्वी प्रांत सिस्तान तथा बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में फैला हुआ है। लेकिन इसका अधिकांश इलाका पाकिस्तान में है, जो पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा है। इसी इलाके में अधिकांश बलूच आबादी रहती है, जो पाकिस्तान की कुल आबादी का महज 5 प्रतिशत के आसपास है। यह सबसे गरीब और उपेक्षित इलाका भी है। कई इलाके के लोगों का आज भी बाहरी दुनिया से ताल्लुकात नहीं हैं।
इस समूचे इलाके यानी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान में अपनी आजादी और स्वतंत्र शासन के लिए सक्रिय बलूच राष्ट्रवादी बृहत्तर बलूचिस्तान की मांग कर रहे हैं यानी ये तीनों देशों में फैले हिस्सों को मिलाकर एक आजाद देश चाहते हैं। 2005 में ईरान में भी यह संघर्ष तेज हुआ था लेकिन इसका जोर पाकिस्तान वाले इलाके में ही सबसे ज्यादा है।
नरेंद्र मोदी भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने आजादी की सालगिरह के मौके पर लाल किले से बलूचिस्तान का जिक्र किया। पीएम मोदी ने पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया और यहां पर जारी मानवाधिकारों के उल्लंघन की बात की। यह ना सिर्फ़ एक राजनैतिक और कूटनैतिक ‘मास्टर स्ट्रोक’ है बल्कि मानवाधिकार दृष्टिकोण से भी एक शानदार पहल है।
इस बात में कोई शक नहीं कि 1948 से लेकर अब तक पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में सितम की इंतहा कर दी है। इस खण्ड में मीडिया पर पूरी तरह से पाबंदी है और ज़मीनी हालात दुनिया तक पहुंचा पाना असम्भव बात है। संसाधनों से भरपूर और फिर भी पिछड़े इलाके में शुमार बलूचिस्तान अपने दोहन के बावजूद विकास के नाम पर कुछ नहीं मिलने के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराता रहा है। लेकिन ये भी सच है कि बलोच नेताओं में भी ऐसे विभीषण पैदा होते रहे हैं जो पाकिस्तान की सरकार और फौज़ की मदद से सत्ता में हिस्सेदारी लेते रहे हैं।
पाकिस्तान फूट डालो और शासन करो की नीति अपना कर सबको साधने की कोशिश करता रहा है। जो नहीं सधता उसके खिलाफ ताक़त का इस्तेमाल होता है या फिर उसे अपना घर छोड़ बाहर शरण लेनी पड़ती है। बलूचिस्तान के पक्ष में कथित तौर पर आवाज बुलंद किए जाने का समर्थन करने के लिए पाकिस्तान ने शीर्ष तीन बलूच राष्ट्रवादी नेताओं के खिलाफ देशद्रोह सहित पांच मामले दर्ज किए हैं; ब्रहमदाग बुग्ती, हरबियार मर्री और बानुक करीमा बलोच के खिलाफ बलूचिस्तान के खुजदार इलाके के पांच थानों में पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 120, 121, 123 और 353 के तहत दर्ज किया गया है जो पाकिस्तानी आलाकमान का डर साफ़ ज़ाहिर करता है।
दक्षिण में ओमान की खाड़ी के उत्तर पर्वत, नदी, जंगल, दलदल और रेगिस्तानी इलाकों का अबूझ देश बलूचिस्तान, अपने अकूत प्राकृतिक संसाधनों की वजह से निरंतर टकराव का क्षेत्र बलूचिस्तान। पाकिस्तानी हुक्मरानों के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और बाहरी आबादी को वहां बसाने के नजरिए की वजह से हाल के दौर में 2003 से यह टकराव अपने चरम पर है। इसमें एक तरफ स्थानीय अलगाववादियों से पाकिस्तानी फौज लड़ रही है तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी तालिबान जैसे हिंसक सुन्नी संगठन वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं और शिया आबादी पर हमले कर रहे हैं। पूरी दुनिया के इंटर्नेट बाशिंदे सिरीया का दर्दनाक चेहरा: ऐलन कुर्दी और ओमरन जैसे बच्चों के फ़ोटो को सोशल मीडिया पर शेयर करते नहीं थकते; ज़ुल्म और हताहती दुनिया का एक चेहर बलूचिस्तान भी है जिसपर ध्यान केंद्रित करने की तुरंत आवश्यकता है। यूएन को इस मसले में दख़ल दे सर्वसहमतीं से एक ऐसा रास्ता निकलना चाहिए जिससे वहाँ के बाशिंदों का दर्द हल्का हो सके और ज़िंदगी को जिया जा सके नाकि घुट घुट के साँसे लीं जाए!
डॉ. राजन पांडेय
एम.बी.बी.एस.,एमडि (सकोल.)
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